ब्लॉग

डीएमके के समर्थन वापस लेने से संकट में घिरी सरकार के लिए सीबीआई एक बार फिर से ब्रह्मास्त्र साबित हुआ और केन्द्रीय मंत्री बेनी की तान पर सरकार को हेकड़ी दिखा रहे मुलायम सिंह की सारी हेकड़ी सीबीआई के नाम पर कुछ ही घंटों में हवा हो गयी..!
डीएमके नेता स्टालिन के घर पर सीबीआई के छापे के बाद खुद प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह भले ही छापे की टाईमिंग को लेकर हैरानी प्रकट करते हुए इसमें सरकार की किसी तरह की भमिका से इंकार कर रहे हों लेकिन पर्दे के पीछे की सच्चाई किसी से छुपी नहीं है..!
सरकार कहती है कि सीबीआई के छापे में सरकार का किसी तरह का कोई दखल नहीं है तो फिर ये बात समझ में नहीं आती कि आखिर फिर छापे की कार्यवाही को अब क्यों रोका गया..? क्या ये सीबीआई के काम में दखल नहीं है..? अगर सीबीआई निष्पक्ष तरीक से अपना काम कर रही थी तो फिर खुद प्रधानमंत्री और सरकार में शामिल मंत्रियों को क्यों डीएमके नेता स्टालिन के घर छापे के बाद इस पर सफाई देने की जरूरत पड़ी..? करने देते सीबीआई को अपना काम...इससे आपके माथे पर चिंता की लकीरें क्यों उभर आयी..?
राजनीति में सरकार को बचाने का मैनेजमेंट भी गजब का है। सहयोगी आंखें दिखाए तो सीबीआई का सिर्फ डर दिखा दो सारा काम अपने आप हो जाएगा..! दामन तो किसी नेता का पाक साफ है नहीं कि किसी मामले में जांच से न घबराएं..! जाहिर है नेताओं का भ्रष्टाचार और बेहिसाब अर्जित की गयी संपत्ति ही उनके मन में सीबीआई का डर पैदा करते हैं, वर्ना क्यों कोई नेता सीबीआई के नाम से ही खौफ खाए..?
सीबीआई को सरकार का ब्रह्मास्त्र यूं ही नहीं कहा जाता...सीबीआई की मारक क्षमता देखिए दक्षिण में डीएमके नेता के घर छापा पड़ता है और उत्तर में सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह के तेवर मिनटों में नरम पड़ जाते हैं। छापे की कार्यवाही के बाद जितनी जल्दी मुलायम के तेवर नरम पड़े इतनी देर में तो हवाई जहाज से भी दक्षिण से उत्तर तक का सफर पूरा नहीं होता है लेकिन मुलायम की कठोरता जाने में देर नहीं लगी।
ऐसा नहीं कि बात सिर्फ मुलायम तक सीमित हो...सरकार को बाहर से समर्थन दे रही बसपा सुप्रीमो मायावती को ही देख लिजिए। सीबीआई के दुरुपयोग और इसका शिकार होने की बात करती हैं लेकिन फिर भी कहती हैं कि सरकार को समर्थन देना जारी रखेंगे। डीएमके की कहानी तो अभी ताजी ही है।
बहरहाल सीबीआई के सहारे सरकार को फिर से कोई नई आफत आने तक राहत की ऑक्सीजन तो मिल ही गयी है। वैसे भी सरकार के पास सीबीआई रूपी ब्रह्मास्त्र तो है ही फिर कोई आफत आई तो उससे भी निपट लेंगे तब तक 2014 भी आ ही जाएगा..!
दीपक तिवारी
दिल्ली गैंगरेप के मुख्य आरोपी राम सिंह समेत सभी पांचों आरोपियों की फांसी की मांग तो गैंगरेप के बाद से ही लगातार पुरजोर तरीके से उठ रही थी लेकिन जब इनमें से एक राम सिंह की फांसी की खबर आई तो अपने आप में कई सवाल खड़े कर गयी। राम सिंह के परिजनों के अलावा शायद ही किसी को राम सिंह की मौत का अफसोस होगा लेकिन इसके बाद भी राम सिंह की मौत नयी बहस को जन्म देकर चली गयी..!

अतिसुरक्षित माने जाने वाली दिल्ली की तिहाड़ जेल में अगर कोई कैदी आत्महत्या करता है तो सवाल उठने लाजिमी है। ऐसे ही कुछ सवाल राम सिंह की फांसी लगाकर आत्महत्या के बाद भी उठ रहे हैं। राम सिंह के परिजनों के आरोपों के बाद सवाल सिर्फ एक है कि राम सिंह ने आत्महत्या की या फिर राम सिंह की हत्या की गयी..?
राम सिंह और उसके साथियों ने 16 दिसंबर 2012 की रात दिल्ली में चलती बस में जो किया उसके लिए मौत की सजा भी कम है लेकिन पुलिस की गिरफ्त में आने के बाद न्यायिक प्रक्रिया के दौरान अति सुरक्षित माने जाने वाली तिहाड़ जेल में राम सिंह का फांसी के फंदे पर झूल कर मौत को गले लगाना जेल प्रशासन के साथ ही में बंद कैदियों की सुरक्षा पर भी सवालिया निशान लगाता है..?
बीबीसी के मुताबिक वर्ष 2010 में देश की 1393 जेलों में कुल 1436 कैदियों की मौत हुई इसमें 92 कैदियों की मौत अस्वाभाविक कारणों से हुई, जिनमें आत्महत्या और कैदिया द्वारा हत्या शामिल है। 92 कैदियों में से भी 68 मौत आत्महत्या से हुई तो 12 कैदियों की साथी कैदियों ने हत्या की। साल 2000 से अब तक के आंकड़ें कहते हैं कि 12 सालों में भारतीय जेलों में 10 हजार से ज्यादा मौत हो चुकी है। सिर्फ तिहाड़ जेल की ही अगर बात करें तो बीते साल तिहाड़ में 18 कैदियों की मौत हुई है जिनमें से दो मामले आत्महत्या के थे। 15 दिनों में तिहाड़ में तीसरी आत्महत्या की घटना ने सबके होश उड़ा के रख दिए हैं।
इस बात को नहीं नकारा जा सकता कि भारतीय जेलों में क्षमता से अधिक कैदियों को रखा जाता है और मौजूदा जेल स्टॉफ सभी कैदियों पर नजर नहीं रख सकता है लेकिन कड़े सुरक्षा इंतजामों वाले सेल में राम सिंह का फांसी के फंदे पर झूल जाना जेल प्रशासन की गंभीर चूक की ओर ईशारा करता है।
ऐसे में अगर राम सिंह के परिजन तिहाड़ जेल प्रशासन पर जेल में हत्या के आरोप लगा रहे हैं तो इस पर हैरान होने की कोई बात नहीं है। ऐसे में सुरक्षा में चूक की बात जब केन्द्रीय गृहमंत्री सुशील कुमार शिंदे भी स्वीकार कर चुके हैं तो अब राम सिंह की पोस्टमार्टम रिपोर्ट और मामले की जांच के बाद सच्चाई से पर्दा उठने की उम्मीद है कि राम सिंह ने वाकई में आत्महत्या की या फिर राम सिंह की हत्या किए जाने के राम सिंह के परिजनों के आरोपों में दम है..!
बहरहाल राम सिंह की मौत ने एक बार फिर से भारतीय जेलों में कैदियों की सुरक्षा के बहाने भारत की सुस्त व लंबी न्याय प्रक्रिया पर भी सवाल खड़े दिए हैं..? जेल में बंद विचाराधीन कैदियों के सालों से लंबित पड़े मामले कहीं न कहीं कैदियों के मानस पर गहरा असर डालते हैं जिनके परिणाम जेल में आए दिन कैदियों की आत्मह्त्या की खबर के रूप में सामने आते हैं। ये वक्त सिर्फ राम सिंह की आत्महत्या या हत्या के मसले को सुलझाने का ही नहीं है बल्कि देश की विभिन्न अदालतों में सालों से विचाराधीन मामलों के निपटारे में तेजी लाने के संबंध में ठोस कदम उठाने पर विचार करने का भी है।
दीपक तिवारी

अपने कार्यकाल के दौरान दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित भले ही जनता के लिए कुछ न कर पायी हों लेकिन चुनावी साल में शीला दीक्षित ने जनता के लिए सरकारी खजाना तो नहीं खोला लेकिन अपने “ज्ञान” का पिटारा जरूर खोल दिया है। शीला जी आजकल जहां जा रही हैं बस ज्ञान बांटती फिर रही हैं। दिल्ली में भूख से हो रही मौतों को रोकने में नाकाम रही शीला दीक्षित पहले अपना ज्ञान बघारते हुए कहती हैं कि 600 रूपए महीने में 5 लोगों के परिवार का पेट बड़ी आसानी से भर जाता है यानि कि बकौल शीला एक व्यक्ति 4 रूपए में भरपेट भोजन कर सकता है। लेकिन इसका जवाब उनके पास नहीं होता कि दिल्ली में भूख से हर हफ्ते एक व्यक्ति क्यों दम तोड़ देता है..?
अब दिल्ली वालों को सस्ती बिजली उपलब्ध कराने में नाकाम शीला जी दिल्ली वालों से कह रही हैं कि ज्यादा बिजली का बिल नहीं भर सकते तो खपत कम करो...शीला जी यहीं नहीं रूकती वे ये भी कहती हैं कि बिल नहीं भर सकते तो कूलर क्यों चलाते हो...कूलर की जगह पंखे चलाओ..!
बिजली दिल्ली वालों को एक के बाद एक झटके दे रहे हैं लेकिन शीला जी के पास इसका कोई ईलाज नहीं है। लेकिन चुनावी साल है ईलाज नहीं कर सकते तो क्या सलाह तो दे ही सकते हैं...शीला दीक्षित ने भी ऐसा ही किया और दिल्लीवालों को खपत कम करके बिजली का बिल कम करने की सलाह दे डाली। अब शीला दीक्षित भले ही उनके बयान का गलत मतलब निकालने के लिए मीडिया के सिर इसका ठीकरा फोड़ कर सफाई देती फिर रही हों लेकिन कहते हैं न दिल की बात तो जुबां पर आ ही जाती है...शीला जी के जुबां पर भी आ गई तो इसमें उनका क्या दोष..?
गनीमत तो ये रही कि प्याज के आसमान चढ़ते दामों पर शीला दीक्षित ने कृषि मंत्री शरद पवार को सिर्फ पत्र लिखकर कीमतों पर नियंत्रण के लिए प्याज का निर्यात कम करने का अऩुरोध किया। दिल्ली वालों से ये नहीं कहा कि प्याज खरीदने की औकात नहीं है तो प्याज खाना छोड़ दो।
शीला जी आप दिल्ली की मुख्यमंत्री हैं...सरकार चला रही हैं, निश्चित तौर पर आप ज्ञानी होंगी लेकिन आपके लिए एक बिन मांगी सलाह है जो आपका सामान्य ज्ञान भी बढ़ा देगी..! बात ये है कि ये जो जनता है न ये भी बड़ी ज्ञानी है...वो भी दिल्ली की जनता सोचो कितनी ज्ञानी होगी...आपसे अनुरोध है कि आप सरकार की मुखिया होते हुए भूख से हो रही मौत नहीं रोक सकती..! दिल्ली वालों को सस्ती बिजली नहीं उपलब्ध करा सकती तो कृप्या करके अपना ज्ञान भी अपने पास ही रखें। कहीं ऐसा न हो कि चुनावी साल में जनता का अपने सामान्य ज्ञान से आपकी सरकार का गणित और भूगोल सब बिगाड़ दे।
पत्रकार
Page 1 of 13