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"सचिन पर राजनीति या राजनीति में सचिन"...?

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Last Updated on Sunday, 30 December 2012 07:32 Written by News Desk Monday, 30 April 2012 22:58

I won't quit cricket for politics: Sachin Tendulkar

पिछले कुछ दिनों से देश के राजनीतिक परिदृश्य में सचिन का ही वर्चस्व बना हुआ है, क्योंकि अब सचिन जल्द ही माननीय सांसद महोदय बनने वाले हैं। लेकिन थोड़ा पीछे चले और याद करें कि जिस दिन सचिन और उनकी पत्नी अंजलि तेंदुलकर का गुपचुप तरीके से सोनिया गांधी से मिलना हुआ और उसके बाद खबर निकल कर आई कि संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन ने सचिन को राज्यसभा में भेजने के लिए मनोनयन किया है। इसके बाद देश की मीडिया ने इस खबर को इतना उछाला की अभी तक उसी विषय पर चर्चा, बयानबाजियां और बतकही जारी है। याद करिए की उसी दिन देश में बोफोर्स मामले में पच्चीस सालो से चला आ रहा एक नया घटनाक्रम जुड़ा, वह था की स्वीडिश जांचकर्ता स्टेनफोर्ड ने यह कहा की अमिताभ बच्चन का नाम इस मामले में केवल घसीटा गया है और वह निर्दोष हैं। और उसी दिन एक और घटना हुई की समाजवादी पार्टी के राज्यसभा सांसद और लोहिया के शिष्य बृजभूषण तिवारी जी का निधन हो गया था। लेकिन इन सभी खबरों को सचिन ने कही पीछे छोड़ दिया था। यह सचिन के प्रति देश का जुनून ही है की राज्यसभा जाने की उनकी खबर उस दिन के प्राइम टाइम में छायी रही।

उसी समय हमारे देश में एक कलेक्टर जिसका नक्सलियों द्वारा अपहरण कर लिया जाता है उसकी रिहाई के लिए होरही दुओं की खबर और उससे निजात पाने की कवायद भी इसी खबर के पीछे छूट जाती है, इसके अलावा स्टैंडर्डस एंड पुअर्स भारत की वित्तीय साख को कम करके आंक रही थी. तेलंगाना के कुछ कांग्रेसी सांसद ही विद्रोही तेवर अख्तियार कर रहे थे. छत्तीसगढ़ में  कलेक्टर का अपहरण कर माओवादी सरकार के साथ सौदेबाजी कर रहे थे. बावजूद इसके खबरों की दुनिया  राज्यसभा के लिए सचिन के मनोनयन के इर्द-गिर्द ठहर गयी | चलिए अगर कल को सचिन राज्यसभा पहुंचेंगे तो क्या कर लेंगे या कांग्रेस का क्या नया कायाकल्प कर सकते हैं। यह भी एक बहस का हिस्सा है क्योंकि आखिर जब कोई सांसद देश की सर्वोच्च सदन में पहुँचता है तो उसे तब असल देश के आकांक्षाओं, नए नीव निर्माण और आधारभूत जरूरतों की पूर्ति करने और नए नियम कानून के साथ उसे इस दिशा में क्रियान्वित करने का जिम्मा होता है।  इसी परिप्रेक्ष्य में हमारे मास्टर ब्लास्टर कल को हमारे देश के लिए क्या नया कर सकते हैं।  अभी तक देश के लिए खेलते हुए उन्होंने केवल रिकार्ड का ही निर्माण किया है और वह रिकार्ड भी हो सकता है की आने वाले समय में जल्दी न टूटे। लेकिन यहाँ सांसद के रूप में उनकी नयी  पारी एक नया प्रश्न  खड़ा करती है की सचिन क्रिकेट में जिस परिपूर्णता की मिसाल बन कर सामने हैं, क्या संसदीय जीवन में भी वे उस परिपूर्णता की ओर आगे बढ़ पायेंगे? सवाल है कि क्या सचिन को यह जीवन रास आयेगा? क्या वह अपनी अलमस्त और अभी तक निर्विवाद वाली छवि को कायम रख पाएंगे ? क्योंकि अब जिस जगह उनकी पारी की शुरुआत होगी वहां की पिच बहुत सपाट और आरोपों के उछाल और बाउंसर पड़ने के लिए जानी जाती है। लेकिन इसीलिए एक ऐसे क्षण में, जब कांग्रेस के बारे में कहा जा रहा है कि उसके भीतर नेतृत्व का संकट है, पार्टी संगठन में भारी फेर-बदल की चर्चाएं हैं, नीतियों को लकवा मार गया है, मंत्रियों पर भ्रष्टाचार को लेकर सवाल उठाये जा रहे हैं, ऐसे निराशाजनक माहौल में सचिन को राज्यसभा के लिए नामित करना उनकी उपलब्धियों का सम्मान कम, कांग्रेस की अपने मौजूदा संकट से उबरने की कोशिश ज्यादा दिखती है. लेकिन यह कवायद ‘इंडिया शाइनिंग’ के नारे की राह पकड़ ले, तो हैरत नहीं होनी चाहिए।

अगर सचिन क्रिकेट के मैदान पर बेजोड़ हैं, तो भारतीय खेलों में मौजूदा समय में ही टेनिस कोर्ट पर लिएंडर पेस, निशानेबाजी में अभिनव बिंद्रा भी मौजूद हैं.अगर एक पल के लिए आप इन नायकों की उपलब्धियों को अहमियत देने से हिचकिचा रहे हों, तो इतना तो मानना ही पड़ेगा कि दिलीप तिर्की ने इसी भारत में हॉकी के मैदान पर उपलब्धियों के नये कीर्तिमान गढ़े. चाहे-अनचाहे क्रिकेट के जुनून के बीच हॉकी आज भी इस देश का राष्ट्रीय खेल है.

दिलचस्प है कि अगर सचिन ने भारत के लिए सबसे ज्यादा अंतरराष्ट्रीय मुकाबले खेले हैं, तो दिलीप टिर्की ने भी सबसे ज्यादा 412 अंतरराष्ट्रीय मुकाबलों में शिरकत की है. तीन बार के ओलिंपियन दिलीप तिर्की भी राज्यसभा पहुंचे हैं. इसी बुधवार को बीजू जनता दल की ओर से दिलीप तिर्की ने राज्यसभा में शपथ ली.दिलीप तिर्की के राज्यसभा पहुंचने की खबर पर एक पल के लिए ठहर कर गौर करें. क्या आपने इसे अखबार या टेलीविजन की स्क्रीन पर उसी शिद्दत से उभार लेते देखा, जैसे सचिन की खबर मीडिया पर हावी है? बिल्कुल नहीं. इसकी साफ वजह है- टिर्की भारतीय हॉकी के बेजोड़ खिलाड़ी हैं, लेकिन उन्हें लेकर कोई मिथक नहीं गढ़ा गया. ठीक यहीं सचिन एक मिथक में तब्दील हो चुके हैं.

वास्तव में यह कोई नयी बात नहीं है की कोई लोकप्रिय अभिनेता या खिलाड़ी या व्यक्तित्व सांसद बन रहा है। आज से पहले भी कई लोग आये और गए हो गए उन्होंने कोई विशेष छाप नहीं छोड़ी कहीं ऐसा ही सचिन के साथ भी न हो यही बहस होनी चाहिए क्योंकि राजनीति में सामंजस्य बैठाना सभी के  बस का नहीं होता नेतृत्व और राजनीति का कीड़ा और उस कीड़े को जीवन पर्यंत जीवित रखने का गुण ईश्वर प्रदत्त होता है , इसी के साथ यही भी सच है की सचिन ने केवल खेल को लेकर ही अपना जीवन देखा और व्यतीत किया है राजनीति उनके लिए कांटो के रास्ते पर चलने जैसा हो सकता है क्योंकि इस राजनीति में सचिन को लेकर केवल एक बात ही निकल आती है की "बहुत कठिन है डगर पनघट की "...।

अभिषेक द्विवेदी

इण्डिया हल्लाबोल

 

आस्था और धर्म के नाम पर होता विश्वास से खिलवाड़.....

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Last Updated on Sunday, 30 December 2012 07:34 Written by News Desk Saturday, 21 April 2012 12:19

blind faith in india

भारत में आज एक अध्यात्म ही ऐसी विषय है जो टैक्स फ्री है , और इस चोखे धंधे में प्राफिट भी बहुत है। तभी तो आज देश में न जाने कितने बाबा , महात्मा और मठाधीश इस धर्म रूपी आध्यात्मिक विषय को व्यावसायिक रूप देकर फल फूल रहे हैं। यहाँ की जनता भी ऐसी है जो कम से कम धर्म और आस्था केनाम पर एकजुट हो जाती है |यह धर्म वास्तविक अध्यात्म ज्ञान के रूप में न हो कर चमत्कारिक रूप को लेकर ज्यादा सफल है ,क्योंकि अध्यात्म के  व्यवहारिक ज्ञान की जगह आज बाबाओं का चमत्कार ज्यादा महत्वपूर्ण हो गया है। वैज्ञानिको ने

वैसे तो विज्ञान, तकनीक तथा सूचना प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में इसी उद्देश्य को लेकर तमाम उपलब्धियां हासिल की हैं ताकि मानव जाति का विकास हो तथा उसका ज्ञानवर्धन हो सके। टेलीविज़न भी इन्हीं अविष्कारों में से एक है जिसका मकसद विश्वस्तर पर सूचना का आदान-प्रदान करना,ज्ञानवर्धक कार्यक्रम प्रसारित करना,लोगों को शिक्षित व जागरूक करना तथा मनोरंजन करना आदि शामिल हैं।

पिछले करीब एक पखवाड़े से देश में एक धर्म विरोधी बयार चल पड़ी है। जहाँ एक तथाकथित सर्वशक्तिशाली और स्वयंप्रभु बाबा निर्मल के दरबार और उनके तृतीय नेत्र के बारे में लगातार आक्षेप और लगातार फर्जीवाड़ो का पता चल रहा है ,कभी यही बाबा अपने भक्तजनों के लिए कलियुग में साक्षात भगवान् के अवतार हो गए थे। कारण इसका सिर्फ वही की हम केवल चमत्कार में विश्वाश करते हैं और यही चमत्कार हमारे साथ होता था {ऐसा उन बाबा के भक्तो का कहना है } । हमारे टी वी चैनल भी उनके चमत्कारों का लाइव प्रसारण लगातार कर रहे थे। वास्तव में यह भक्ति फैलाने का सबसे बड़ा योगदान हमारे टी वी चैनलों का ही है। परन्तु बाजारवाद की आंधी ने तो लगता है कि इन सभी वैज्ञानिक अपलब्धियों के उद्देश्य को ही बदल कर रख दिया है। आज अधिकांश ऐसे टीवी चैनल जो कि बाज़ारवाद की इस आंधी का शिकार हो चुके हैं वे अपने टीवी चैनल्स के प्रसारण को केवल व्यवसायिक दृष्टिकोण से ही देख रहे हैं। परिणामस्वरूप न केवल टेलीविज़न के आविष्कार का मकसद बदल गया प्रतीत होता है बल्कि यही चैनल्स आम लोगों को गुमराह व पथभ्रष्ट भी करने लगे हैं। इसका कारण शायद केवल यही है कि टीवी कंपनियों को केवल पैसा दरकार है और कुछ नहीं। अब चाहे वह पैसा अशिष्ट कार्यक्रमों के प्रसारणों से आए,सनसनीखेज़ समाचारों से मिले,अभद्र विज्ञापनों के प्रसारण के द्वारा आए पक्षपातपूर्ण प्रसारण से प्राप्त हो या कथित अध्यात्मवाद का दरबार सजाने से आए या फिर पूर्वाग्रही खबरें बेचने से ही क्यों न मिले। टीवी चैनल्स को तो सिर्फ पैसे की ही दरकार रह गई है।

आज हमारे देश में भक्ति और अध्यात्म की बाढ़ सी आ गयी है। आज इस अध्यात्म को हमारे चैनलों ने  सर्व सुलभ बना दिया है। जिस अध्यात्म की खोज में हमारे ऋषि मुनि पहले जंगल पाषाण और कंदराओ में भ्रमण करते थे उसी भक्ति और अध्यात्म को आज सूचना की क्रांति ने व्यक्ति के बेडरूम में प्रवेश करा दिया है | यह भी एक वैश्वीकरण  का ही अंग है |ऐसा नहीं की यह अध्यात्म का उन्नत प्रसार त्वरित प्रक्रिया है गत एक दशक सेतो हमारे देश में इन्हीं टीवी चैनल्स के पूरी तरह सक्रिय होने के बाद तो लगता है भारत में अध्यात्म की गोया बाढ़ आ गई हो। पूरे देश में चारों ओर जहां भी जाईए और जो भी चैनल देखिए उनमें ज्य़ादातर तथाकथित अध्यात्मक गुरू आपको धर्म,अध्यात्म,जीने की कला,स्वास्थ्य तथा राजनीति का घालमेल,योग शास्त्र आधारित उपचार आदि न जाने क्या-क्या परोसते दिखाई देते हैं। इन कथित अध्यात्मिक गुरुओं के समक्ष जो भीड़ बैठी दिखाई देती है उसे देखकर तो ऐसा प्रतीत होता है गोया पूरा देश ही इन कथित अध्यात्मिक गुरुओं की ही शरण में जा चुका है। निश्चित रूप से यह सब केवल टीवी चैनल्स के प्रसारण का ही कमाल है। बड़े-बड़े धनवान संतों, महात्माओं, आश्रम संचालकों तथा कथित धर्मगुरुओं ने विभिन्न टीवी चैनल्स पर प्रसारण का समय खरीद रखा है। कोई 15 मिनट अध्यात्म का पाठ पढ़ाता है तो कोई आधा घंटा तो कोई एक घंटा। वैसे तो इन टीवी चैनल्स के समय की कीमत चैनल की लोकप्रियता,टीआरपी व टीवी बाज़ार में उस चैनल की अपनी लोकप्रियता पर र्निभर करती है फिर भी मोटे तौर पर एक किश्त के प्रसारण का मूल्य 10 लाख रूपये से लेकर 50 लाख रूपये तक बैठता है। गोया साफ है कि इस प्रकार की अध्यात्म की दुकान टीवी पर सजाने वाले धर्मगुरुओं को अपने प्रवचनों अथवा अन्य कथित अध्यात्मिक प्रसारणों हेतु करोड़ों रूपये खर्च करने पड़ते हैं।

यदि आज हम किसी भी धर्मगुरु की बातें सुनें तो हम देखते हैं कि वह सार्वजनिक रूप से अपने अनुयाईयों को शांति, सद्भाव, प्रेम, गुरु महिमा, धार्मिक रास्ते पर चलने, नामदान जपने तथा उसका आदर करने, अपने गुरुओं के प्रति सच्ची श्रद्धा व गहन आस्था रखने, व्यवसाय में तरक्क़ी करने, पारिवारिक संकट से उबरने, आर्थिक रूप से संपन्न होने, कमाई में बरकत होने जैसी आकर्षक बातें बताता है या फिर इनके उपाय सुझाता है। कई तथाकथित गुरु ऐसे भी हैं जो अपने इन प्रवचनों की कीमत स्वरूप अपने भक्तों से धन भी मांगते हैं, कई गुरु अपने बैंक अकाऊंट नंबर टी वी पर दिखाते हैं तथा उसमें पैसे डालने हेतु भक्तजनों को प्रोत्साहित करते हैं। परंतु कम से कम मैंने तो आज तक यह नहीं देखा कि किसी आध्यात्मिक गुरु ने अपने प्रवचन को इस बात पर केंद्रित रखा हो कि वह अपने भक्तों को अवैध कमाई करने से रोक रहा हो, भ्रष्टाचार, मिलावट खोरी या रिश्वतखोरी के विरुद्ध प्रवचन देता हो या ऐसा कहता दिखाई देता हो कि हमारे प्रवचन,समागम या हमें भेंट किए जाने वाले पैसों में किसी भी भक्त की किसी प्रकार की अवैध या भ्रष्टाचार की काली कमाई का कोई भी हिस्सा शामिल नहीं होना चाहिए। बजाए इसके ऐसे ही कई कथित बाबा अपनी स्वार्थसिद्धि के चलते अथवा राजनैतिक प्रतिद्वंद्विता या पूर्वाग्रह के कारण सरकार, शासन व प्रशासन पर ही भ्रष्टाचार व रिश्वतखोरी जैसे मुद्दे पर निशाना साधे रहते हैं या उनकी आलोचना करते रहते हैं। गोया देश में भ्रष्टाचार, हरामखोरी व रिश्वतखोरी जैसे बढ़ते जा रहे नासूर को रोकने के लिए यह ‘गुरुजन’ केवल कानून व सरकार से ही उम्मीदें लगाए रहते हैं अपने भक्तजनों या अनुयाईयों से नहीं।

यह तो हुई आज के समाज की तथाकथित उन्नत भक्ति भावना की जो आशा है आने वाले समय में उन्नता की अपनी पराकाष्ठा को छुएगी लेकिन अगर बात यहाँ पर बाबा निर्मल की करें तो उनके समागम की असलियत सामने आ जाने के बाद अब लगातार उनके भक्तो के सेंसेक्स में भारी गिरावट जारी है। उनके पिछले इतिहास को भी मीडिया द्वारा लगातार खंगाला जा रहा है , और सच्चाईयों को उजागर किया जा रहा है |लेकिन मीडिया के इस रवैये पर यह सवाल भी उठता है की आज के कुछ दिन पूर्व तक जो बाबा उनके लिए एक मोटी कमाई का जरिया थे आज उसी बाबा के पीछे हाथ धो कर पीछे पड़ जाना  कितना न्यायसंगत है। यह तो पुराणों में वर्णित भस्मासुर के कथा का ही अनुकरण कराती है जहाँ भगवान् शिव ने भस्मासुर को  वरदान देकर उसके घमंड को परवान चढ़ा कर उसका अंत भी कर दिया था आज वही कथा दोहराई जा रही है जहाँ इन्ही बाबा निर्मल जीत सिंह नरूला का पहले तो गुणगान किया गया और अब जब चादर पर दाग का पता चला तो मैली चादर को धोने की कवायद शुरू की गयी है।

याद कीजिये जब देश में बाबा के समागम के नाम पर हो रहे धंधे का उजागर हुआ तो बाबा को ढूंढने की कवायद शुरू हुई और इस कवायद में सबसे पहले बाजी मारी देश के सबसे तेज़ रहने का दावा करने वाले विशिष्ट चैनल ने। उस प्राइम टाइम के प्रसारण ने देश में एक नयी बहस को जनम दिया की आखिर बाबा इसी चैनल के साथ  अपना सन्देश देश और भक्तो को संबोधित करने के लिए क्यों प्रगट हुए। क्या पता यहाँ भी कोई तोल मोल न हुआ हो की हे बाबा ! आज तो हमारी लाज रखो प्रगट हो जाओ। इसके बदले में चाहो तो एक हफ्ता और समागम कर लो ,लेकिन हमारे मार्फ़त अपनी बात रख दो सबके सामने।

लेकिन इस भेंट वार्ता में जब उनके कुशल प्रस्तोता ने यह कहा की ज्ञात सूत्रों के अनुसार आपकी ज्ञात आय 85 करोड़ है तो बाबा ने ताल ठोक कर कहा की आप गलत है आपके जानकारी के लिए मै बता दूँ की मेरी आय लगभग 235--240 करोड़ है। और जब बाबा से यह पूंछा गया की आप प्रति भक्त से पैसा क्यों लेते है तो बाबा ने फिर कहा की अगर पैसा नहीं लूँगा तो आप हमें फ्री में थोड़े नहीं दिखाएंगे। यहाँ प्रस्तोता निरुत्तर हो गए।

लेकिन इस सभी बातो से कई बातो का पता चलता है अगर भक्ति भावना का व्यवसायीकरण नहीं हुआ होता तो यह निर्मल बाबा जैसे धर्म के नाम पर दुकान चलाने वाले बाबाओ का पदार्पण न होता जो आज धार्मिक विश्वास का मजाक बना रहे हैं। उन्हें और बढ़ावा दे रहे हैं हमारे लोकतंत्र के चौथे पाए यानी मीडिया। यह वही मीडिया है जो दावा करती है की चौबीस घंटे वह खबर दिखाते हैं लेकिन सच्चाई यह है की खबरों से उनका कोई वास्ता नहीं होता उन्हें सिर्फ चाहिए सेंसेशनल और ऐसे कोई बाबा केसमागम जिसके बल पर वह अपनी व्यावसायिक साख मजबूत कर सकें।


--अभिषेक द्विवेदी--

{इण्डिया हल्लाबोल ,दिल्ली }

 
 

शैक्षिक सिद्धांतो पर प्रतिबन्ध , वर्तमान युवा का विचार शून्य होना तय...

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Last Updated on Sunday, 30 December 2012 07:35 Written by News Desk Monday, 16 April 2012 12:59

learning theories in education

पश्चिम बंगाल के सत्ता पर  ममता बनर्जी का पदार्पण जब से हुआ है एक सूत्री कार्यक्रम क्रियान्वित किया जा रहा है कि किसी तरह से वामपंथियों के द्वारा बनाई गयी व्यवस्था पर चोट किया जाय  , चाहे जैसे हो।  चाहे विचार पर प्रतिबन्ध लगा कर या फिर प्रशासनिक और राजनैतिक सिद्धांतो   पर प्रतिबन्ध लगा कर।  ताज़ा उदहारण ममता बनर्जी सरकार का शैक्षिणिक पाठ्यक्रम में से कार्ल मार्क्स और फ्रेडरिक एंजेल्स और रुसी बोल्शेविक क्रांति पर रोक लगाने कि कवायद शुरू हो गयी है।

ऐसा नहीं है कि यह तुरत फुरत का मामला है, इसके लिए पाठ्यक्रम पुनर्गठन समिति गठित की थी। हालांकि समिति की पूरी रिपोर्ट अभी औपचारिक तौर पर सामने नहीं आई है, मगर इसकी कई सिफारिशों पर विवाद शुरू हो गया है। समिति का सबसे विवादास्पद सुझाव उच्च माध्यमिक कक्षाओं के राजनीति विज्ञान और इतिहास के पाठ्यक्रम से कार्ल मार्क्स, एंजेल्स और रूसी क्रांति को बाहर करने का है। कुछ दिन पहले ममता सरकार ने राज्य के सरकारी पुस्तकालयों में मंगाए जाने वाले अखबारों की नई सूची जारी की थी। इस सूची से उन अखबारों को बाहर कर दिया गया, जो राज्य सरकार की आलोचना करने में संकोच नहीं करते। तृणमूल सरकार के इस फैसले पर भी खासा हंगामा मचा, इसे प्रकारांतर से समाज के जानने के अधिकार को कुंठित करने वाला कदम कहा गया। यह सवाल उठा कि क्या राज्य सरकार ही यह तय करेगी कि क्या पढ़ना चाहिए और क्या नहीं? तब ममता बनर्जी ने खम ठोंक कर कहा था कि हां वे यह बताएंगी कि विद्यार्थी क्या पढ़ें और क्या न पढ़ें। उनके इस इरादे की झलक भी सामने आ गई है।

लेकिन यहाँ ममता जी को कौन समझाए कि बिना मार्क्स और लेनिन के बिना क्या विश्व राजनीति और सामाजिक अध्ययन कि परिकल्पना की जा सकती है ? या बिना इनके राजनीति विज्ञान और विश्व इतिहास के गूढ़ विचारों को समझना आसान हो सकता है ? पर इसका मतलब यह नहीं कि राजनीतिक-आर्थिक-सामाजिक चिंतन और विश्व के इतिहास में उनके असाधारण योगदान के बारे में पढ़ना गैर-जरूरी मान लिया जाए। अपनी इस पहल के पीछे तृणमूल सरकार की दलील है कि वाम मोर्चा शासन के दौरान बना पाठ्यक्रम असंतुलित था।

जब मै पढ़ाई कर रहा था तब मैंने भी मार्क्स, लेनिन और एंजेल्स को पढ़ा था। इसके बाद विश्वविद्यालयीय स्तर पर उनके सिद्धांतो और दार्शनिक सिद्धांतो का विस्तृत अध्यन किया था। उनके सिद्धांत और विचार वास्तविक राजनीतिक सामाजिक और आर्थिक सिद्धांतो को समझने और समझाने के लिए आसानी पैदा करते थे। यदि ममता बनर्जी और उनके शिक्षा सलाहकारों के दृष्टिकोण से देखें तो पूरे बंगाल के विद्यार्थी दयानंद सरस्वती,स्वामी विवेकानंद,बंकिम चंद चटर्जी,राजा राम मोहन राय,रविन्द्र नाथ टैगोर, सुभाष चंद्र बोस,चारु मजुमदार की जीवनी को पढ़ने के बावजूद,उन जैसा क्यों नहीं बन पाए…? अगर यहीं उन पर काउंटर किया जाय की आज वर्तमान राजनीतिक और सामाजिक परिवेश में यदि उन महान विभूतियों का अनुकरण करना शुरू कर दिया जाय और व्यवस्था परिवर्तन का बीड़ा उठाया जाय तो क्या ऐसा करने दिया जाएगा ? यदि आज सुभाष चन्द्र जैसा व्यक्तित्व समाज के उत्थान के लिए कार्य करे या फिर राजाराम मोहन राय जैसा व्यक्ति फिर से से समाज में हो रही कुरीतियों के विरुद्ध आवाज उठाए तो क्या सरकार उसे ऐसा सरकार विरोधी और भ्रष्ट व्यवस्था विरोधी कदम उठाने देगी। शायद नहीं क्योंकि इतने भर से ही सरकारों की सांस फूलने लगती है और आगे की कार्यवाई का आंकलन करने लगती हैं।

यह सही है कि विद्यार्थियों को किसी एक खास विचारधारा का घोल पिलाने का प्रयास नहीं होना चाहिए,बल्कि दुनिया के सभी विचारधाराओं सहित समाज-संस्कृति, राजनीति-इतिहास और धरोहरों से अवगत कराने का भरसक प्रयास के साथ ही मकसद भी होना चाहिए. यह बड़ा ही अफसोसजनक बात है कि ऐसा नहीं हो रहा है.जो भी राजनैतिक पार्टियां सत्ता में आती हैं,वे सभी अपनी मनपसंद का पाठ्यक्रम चलाना चाहती हैं।

अंततः यहाँ यही कहना उचित है की सरकारों का एक तरह से विचारों का यह थोपने वाला काम गैर जिम्मेदाराना और शर्मनाक है। इसके परिप्रेक्ष्य में यदि वास्तविक स्थिति बदलनी है तो आज विद्यार्थियों और शिक्षार्थियों को पढ़ाई के नाम पर खोखला ज्ञान नहीं ,वास्तविक और सैद्धांतिक ज्ञान देने की आवश्यकता है। नहीं तो आने वाले समय में अगर यही शिक्षा पद्धति रही तो युवा केवल सफल मुर्दा ही रहेगा। जहाँ सफल तो अपने कार्यक्षेत्र में रहेगा और मुर्दा अपने समाज और बुद्धिजीवी वर्ग में ज्ञान के नाम पर कहा जाएगा। जिसमे ज्ञान के नाम पर विवेक शून्यता और विचारहीनता ज्यादा नजर आएगी।

-- अभिषेक द्विवेदी --


 
 

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