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दो पड़ोसी और अल्पसंख्यक

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Last Updated on Sunday, 30 December 2012 07:20 Written by News Desk Thursday, 23 August 2012 20:15

Two neighboring and minority

भारत और पाकिस्तान ये दोनों पड़ोसी सन 1947 के अगस्त महीने के मध्य में स्वतंत्र हुए थे। आज, स्वतंत्रता के 65 साल बाद, इन दोनों देशों में अल्पसंख्यकों की क्या स्थिति है? बेहतर प्रजातंत्र की स्थापना के लिए इस प्रश्न का उत्तर जानना महत्वपूर्ण होगा।

 
विगत 11 अगस्त को मुंबई के आज़ाद मैदान में 50,000 से अधिक लोग इकठ्ठा हुए। इनमे से अधिकांश मुसलमान थे और वे म्यानमार और असम में मुसलमानों के खिलाफ हो रही हिंसा पर अपना विरोध जताने के लिए जुटे थे। सभा में कुछ उत्तेजक पोस्टर प्रदर्शित किये गए और भडकाऊ भाषण हुए। इसके बाद, भीड़ हिंसक हो गयी और उसने मीडिया को अपना निशाना बनाया। यह इसलिए किया गया क्योंकि श्रोताओं का ख्याल था कि मीडिया ने असम के उन मुसलमानों की बदहाली को पर्याप्त तरजीह नहीं दी, जो कि जुलाई में वहां बोडो और मुसलमानों के बीच भड़की हिंसा के कारण विस्थापित हो गए हैं। असम में हुई हिंसा में 70 लोग मारे जा चुके हैं और 4 लाख से अधिक मुसलमान और बोडो अपने घरबार छोड़ कर शरणार्थी शिविरों में शरण लेने पर मजबूर हो गए हैं। इस पूरे घटनाक्रम में असम सरकार की भूमिका निहायत शर्मनाक रही है।


मुंबई में भीड़ ने कुछ ओ़बी़ वैनो को आग के हवाले कर दिया। हिंसक भीड़, पुलिसकर्मियों से भी भिड़ गई। महिला पुलिसकर्मियों के साथ अश्लील व अशालीन व्यवहार किया गया व पुरूष पुलिसवालो के साथ मारपीट हुई। हिंसा पर नियंत्रण पाने के लिये पुलिस को गोलीचालन करना पड़ा जिसमें दो युवक मारे गये। भीड़ और पुलिस के बीच हुई भिडं़त में कई पुलिसकर्मी भी घायल हुए। रैली की आयोजक, रज़ा अकादमी, ने हिंसा के लिये माफी मांगी है और कहा है कि भीड़ में कुछ अवांछित व असामाजिक तत्व घुस आये थे। परन्तु आयोजक इस त्रासदी के लिये अपनी जिम्मेदारी से बच नही सकते। किसी भी विरोध प्रदर्शन का पूरी तरह प्रजातांत्रिक और अहिंसक होना आवश्यक है। आम सभाओं में दिये जाने वाले भाषणों में संतुलित भाषा का इस्तेमाल होना चाहिए। घृणा फैलाने वाली और भड़काऊ बाते करने की इज़ाज़त किसी को नही दी जा सकती।


उसी हफ्ते में यह खबर आयी कि करीब 300 हिन्दू, पाकिस्तान की सीमा लांघ कर भारत आ गये हैं। वे तीर्थ यात्रा के लिये भारत आये थे परन्तु उनमें से कई ने कहा है कि वे वापिस नही जायेंगे क्योंकि पाकिस्तान में वे स्वयं को सुरक्षित महसूस नही करते। इनमें से अधिकांश हिन्दू, सिंध व बलूचिस्तान से हैं। ऐंसी खबरें हैं कि पाकिस्तान में हिन्दू लड़कियों का अपहरण कर उन्हें जबरन मुसलमान बनाने का सिलसिला जारी है। ऐसा भी कहा जा रहा है कि पाकिस्तान में धार्मिक अल्पसंख्यकों को दूसरे दर्जे के नागरिकों के तरह जीना पड़ रहा है। पाकिस्तान में जिन धार्मिक अल्पसंख्यकों का दमन हो रहा है, उनमें हिन्दू, सिक्ख और ईसाईयों के अतिरिक्त शिया और अहमदिया भी शामिल हैं।


स्वतंत्रता के समय, हमने प्रजातांत्रिक और धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र बनने का संकल्प लिया था। आज, 65 वर्ष बाद स्थिति क्या है। भारत तो धर्मनिरपेक्षप्रजातांत्रिक राष्ट्र के रूप में अस्तित्व में आया ही था पाकिस्तान जिसका निर्माण इस्लाम के नाम पर भारतीय उपमहाद्वीप के मुस्लिम बहुल इलाकों को मिला कर किया गया था की नींव भी धर्मनिरपेक्ष सिद्घांतों पर रखी गई थी। मोहम्मद अली जिन्ना का 11 अगस्त 1947 का प्रसिद्ध भाषण इस तथ्य को रेखांकित करता है। उन्होंने कहा था कि पाकिस्तान में राज्य का धर्म से कोई लेनादेना नही होगा और लोग मस्जिदो, मंदिरो, चर्चों या जहाँ भी चाहें वहां ईश आराधना के लिये जाने को स्वतंत्र होंगे। उन्होंने कहा था कि धर्म, नागरिको का व्यक्तिगत मसला है जिससे राज्य को कोई मतलब नही होगा। उन्होंने यह भी कहा था कि पाकिस्तान के झंडे में सफेद रंग अल्पसंख्यकों का प्रतीक है। परन्तु तथ्य यह है कि पाकिस्तान का संपूर्ण तंत्र सांप्रदायिक था। जिन्ना ने अपने भाषणों में चाहे जो भी कहा हो परन्तु पाकिस्तान के निर्माण का आधार वहां के सामंती तत्व थे और उनका नज़रिया बिल्कुल स्पष्ट था। शनै:शनै: पाकिस्तान का सांप्रदायिकीकरण होता गया और सन 1970 के दशक के अंत तक, वहां ज़िया उल हक़ और मौलाना मौदूदी जैसे लोगों का बोलबाला हो गया। मुल्ला, समाज के नेता बन गए और मुल्लामिलिट्री गठबंधन, जिसे अमेरिका का पूरा समर्थन प्राप्त था और जिसकी मर्जी पाकिस्तान में चलती थी, ने जिन्ना के भाषण के परखच्चे उड़ा दिये। यहां तक कि शिया और अहमदिया जैसे मुस्लिम अल्पसंख्यकों को भी पाकिस्तान में भेदभाव का सामना करना पड़ रहा है और धार्मिक असहिष्णुता के चलते, राजनीति में उनका दखल बहुत कम हो गया है।


दूसरी ओर, भारत में गांधी और नेहरू जिन्होंने कि भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के मूल्यों को ग़ा था की धर्मनिरपेक्षता के प्रति संपूर्ण और अडिग प्रतिबद्धता थी। गांधी, धर्मप्राण हिन्दू थे तो नेहरू नास्तिक, परन्तु उन दोनो का यह स्पष्ट विचार था कि राज्य को सभी धमोर्ं के लोगो को बराबरी की नजर से देखना चाहिये और आस्था से संबंधित मुद्दों की राज्य के नीति निर्धारण में कोई भूमिका नही होनी चाहिए। इस नीति को लागू करने में नेहरू को दो तरह की समस्याओं का सामना करना पड़ा। पहली यह कि यद्यपि भारत का संविधान धर्मनिरपेक्ष था तथापि समाज पर धार्मिकता का गहरा रंग च़ा हुआ था। इससे धर्मनिरपेक्ष नीतियों को पूरी तरह लागू करने में समस्या आई। दूसरी, धर्मनिरपेक्ष मूल्यों में आस्था रखने वाली कांग्रेस में कई सांप्रदायिक तत्वों ने घुसपैठ कर ली थी। इस सिलसिले में नेहरू द्वारा कई बार चेतावनियां दी गइंर परन्तु उन पर पार्टी के नेताओं ने कोई ध्यान नही दिया और नतीजतन कुछ वषोर्ं बाद, कांग्रेस के कुछ नेताओं और साम्प्रदायिक संगठनो के कर्ताधर्ताओं के बीच कुछ खास अंतर नहीं बचा।


किसी भी देश में प्रजातंत्र की सफलता का मानक होता है वहां अल्पसंख्यकों को प्राप्त सुरक्षा और बराबरी का दर्जा। पिछले तीन दशकों में कई जटिल कारणों से समाज में साम्प्रदायिक तत्वों का बोलबाला हैं। परन्तु इस मामले में पाकिस्तान में स्थिति काफी अलग हैं। पाकिस्तान की राजनीति में साम्प्रदायिक ताकतों के लिये हमेशा से जगह रही है। वहां सैनिक तानाशाहों का राज स्थापित हो जाने से फिरकापरस्त ताकतों का काम और आसान हो गया। अमेरिका के पाकिस्तान के आंतरिक मामलो में हस्तक्षेप और अमेरिका की अफगान नीति के कारण पाकिस्तान में सांप्रदायिक तत्वों की ताकत में और इजाफा हुआ।


भारत में साम्प्रदायिकता में ब़ढोत्तरी के पीछे अन्य कारण थे। इनमें शामिल हैं राजनैतिक अवसरवाद, चुनाव प्रणाली में कमियां, सांप्रदायिक ताकतों की बहुसंख्यक वर्ग के मन में अल्पसंख्यकों का डर पैदा करने में सफलता और राम मंदिर जैसे भावनात्मक मुद्दों पर राजनीति। आज यद्यपि मुसलमान कुल आबादी का केवल 13़4 प्रतिशत हैं तथापि सांप्रदायिक हिंसा का शिकार होने वालों में उनका प्रतिशत 90 से अधिक है। सभी सामाजिकआर्थिक मानकों पर मुसलमानों की स्थिति बहुत खराब है। सच्चर समीति की रिपोर्ट से यह तथ्य पूरी तरह साबित हो गया है। पाकिस्तान में हिन्दू अल्पसंख्यकों का आबादी में प्रतिशत लगातार घटता जा रहा है। सुरक्षा और सामाजिक दर्जे की दृष्टि से उनकी हालत बहुत खराब है। परन्तु किसी एक देश में अल्पसंख्यकों के साथ अन्याय, किसी दूसरे देश में ऐसा ही करने का औचित्य नही बन सकता। इस तरह की प्रतिक्रियावादी सांप्रदायिकता का इस्तेमाल राजनैतिक ताकतें करती रहीं हैं। भारत में साम्प्रदायिक ताकते, हिन्दुओं के पाकिस्तान से पलायन और असम हिंसा को हिन्दुओं पर आक्रमण बताती हैं तो पाकिस्तान में भारत के मुसलमानों के खिलाफ हो रही ज्यादतियों की खबरों का इस्तेमाल वहां के हिन्दू अल्पसंख्यकों का और अधिक दमन करने के लिये किया जाता है। भारत में बाबरी मस्जिद के हाए जाने की प्रतिक्रिया स्वरूप पाकिस्तान में कई मंदिर जमींदोज़ कर दिये गये थे।


इसमें कोई दो मत नही कि धर्मनिरपेक्षता के मामले मे भारत और पाकिस्तान की स्थिति में जमीन आसमान का फर्क है। अनेक कमियों के बावजूद, धर्मनिरपेक्षप्रजातांत्रिक मूल्य आज भी भारत की व्यवस्था की नींव बने हुए हैं। हालांकि यह भी सही है कि पिछले कुछ समय से ये कमजोर होते जा रहे हैं। पाकिस्तान में तो नाममात्र का प्रजातंत्र हैं और वहां प्रजातंत्र के जड़ें पकड़ने की कोई संभावनाएं भी नज़र नही आ रहीं हैं। दोनो ही देशो में अल्पसंख्यक परेशानहाल हैं। परन्तु पाकिस्तान में उनकी हालत भारत से कहीं बदतर है।
इस सब का अंतिम नतीजा क्या होगा? साम्प्रदायिकता किसी भी देश के विकास में एक बड़ा रोड़ा होती है। समाज के कमजोर वर्गों को आगे ब़ने के मौके उपलब्ध कराने के लिये सकारात्मक कदम उठाये जाना आवश्यक है। उन्हें सुरक्षा और आगे ब़ने के अवसर मुहैय्या कराये जाने चाहिये। हमें हमारे स्वाधीनता आंदोलन के स्वतंत्रता, बंधुत्व और समानता के मूल्यों को याद रखना होगा। भारत में हमारी सामाजिक और राजनैतिक आवश्यकताओं के अनुरूप, चुनाव प्रणाली में व्यापक परिवर्तन किये जाने की आवश्यकता है। सांप्रदायिक हिंसा और अल्पसंख्यकों के साथ भेदभाव से न केवल हमारे राष्टी्रय हितो को नुकसान पहुंचता है वरन ये मानवता के विरूद्ध भी हैं। हमें इन प्रवॢत्तियों को रोकना होगा और उन मूल्यों को ब़ावा देना होगा जिनके कारण हम एक उदार, सहिष्णु और प्रगतिशील समाज कहे जाते हैं।
पाकिस्तान को भी चाहिये कि वह जिन्ना के 11 अगस्त 1947 के भाषण में वर्णित मूल्यों को पुनर्स्थापित करे। वहां अल्पसंख्यकों का आबादी में घटता प्रतिशत और उनका देश से पलायन, पाकिस्तान के संस्थापक का घोर अपमान है।

अजय भाटीवाल


 

कोयला महाकाव्य के नायक भी हर महाकाव्य की तरह मर्यादा पुरुषोत्तम!

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Last Updated on Sunday, 30 December 2012 07:22 Written by News Desk Tuesday, 21 August 2012 00:28

coal scam in india

कोयला माफिया की बात करें तो जेहन में फौरन धनबाद और कोरबा के नाम कौंधते हैं। अनुराग कश्यप की फिल्म ट्विनवासेपुर गैंग्स ने त कोयला माफिया का दायरा धनबाद के एक मोहल्ले और दो परिवारों के खूनी रंजिश में सीमाबद्ध करदिया। पर कोयला आवंटन मामले में कैग की रिपोर्ट के बाद सरकार कितनी मुश्किल में फंसी यह तो कहना मुश्किल है,पर कोयला माफिया के राष्ट्रीय चेहरे की झलक दीखने लगी है, जिसके आगे धनबाद कोरबा के माफिया बेहद बौने हो गयेहैं।सीएजी की रिपोर्ट में साफ कहा गया है कि कॉर्पोरेट घरानों को कोयले की खानें सरकार ने कौड़ियों के भाव दी है। इसरपट से खूनी रंजिश के बजाय कारपोरेट वार की महाभारती पृष्ठभूमि भी साफ नजर आती है। रिलायंस को यूएमपीपी केठेके देने में नियमों की धज्जियां उड़ा दी गई।इंदिरा जमाने में रिलांयस के हैरतअंगेज उत्थान को भी लोग भूल चुके हैं,जिसे अब तरह तरह के माध्यमों में महिमामंडित किया जाता है। ये आवंटन 2004 से 2006 के बीच हुए जब कोयलामंत्रालय खुद पीएम मनमोहन सिंह देख रहे थे।रिलायंस पावर ने अतिरिक्त कोयला आवंटन पर सीएजी का खंडन कियाहै। कोयला खानों के राष्ट्रीयकरण के बाद से यह खेल जारी है, जिससे देश की राजनीति चलती रही है। लोग शायद यहकिस्सा भूल चुके होंगे कि कैसे केंद्र में काबिज एक प्रधानमंत्री से धनबाद के मफिया सरताज के मधुरतम रिश्ते रहे हैं।तब सत्तादल के राष्ट्रीय अधिवेशन के लिए धनबाद के कनात काफी चर्चा में आये थे।इस कैग रपट को बी भुला देने मेंशायद ज्यादा देर नहीं लगेगी। तमाम घोटालों से घिरी सरकार ने जो राजनीतिक और प्रशासनिक दक्षता उन घोटालों कोरफा दफा करने में दिखाया है, किंचित देश चलाने और जनता की तकलीफों को दूर करने में यही करतब दिखाया होता, तोविकास दर कथा में नियतिबद्ध न होते हम। कोयला महाकाव्य के नायक भी हर महाकाव्य की तरह मर्यादा पुरुषोत्तमदीखते हों,तो यह परंपरा और संस्कृति दोनों के माफिक ठीक है और कारोबार के लिहाज से अत्यंत सुविधाजनक। इसकैग रपट से पहले पहले से संकट में फंसे कोल इंडिया को निजी बिजली कंपनियों को कोयला आपूरिति सुनिश्चित करनेके लिए सीधे राष्ट्रपति भवन से डिक्री जारी हुआ था। पर इस कारपोरेट लाबिंइंग पर मीडिया और राजनीति दोनों नेरणनीतिक मौन धारण किये रखा।अब मौन जरूर टूटता दीख रहा है, लेकिन हर घोटाले के बेपर्दा होने के बाद यह तो सत्तासमीकरण साधने की परंपरागत कवायद है, कालेधन की व्यवस्था को बदलने के लिए नहीं।कैग ने संसद में आज तीनरिपोर्ट पेश कीं, जिनमें कहा गया है कि निजी कंपनियों को लाभ पहुंचाया गया है। इस पर रिलायंस पावर ने त्वरितप्रतिक्रिया में कहा कि अंकेक्षण आकलन में घरेलू कोयले के उत्पादन को बढ़ाने के हित को ध्यान में नहीं रखा गया।अपने बचाव में दिल्ली इंटरनैशनल एयरपोर्ट लि. (डायल) की नियंत्रक कंपनी जीएमआर ने नवंबर 2006 के उच्चतमन्यायालय के उस आदेश का हवाला दिया, जिसमें बोली प्रक्रिया को वैध और सही करार दिया गया था। सरकार की दलीलहै कि सीएजी का विंडफॉल गेन्स का दाव भ्रामक, अनुमानित और काल्पनिक है। सासन यूएमपीपी का 160 मीट्रिक टनसरप्लस कोयला सिर्फ 1,700 करोड़ रुपये था। वहीं सासन यूएमपीपी का 29,033 करोड़ रुपये का आकलन 1700 फीसदीज्यादा है। कोल इंडिया की कीमतों पर नुकसान का अंदाजा लगाना गलत है। कोयला मंत्रालय कैप्टिव ब्लॉक के सरप्लसकोल पर पॉलिसी बना रहा है। माना जा रहा है कि सरकारी कंपनियों को बिना बोली लगाए कोल ब्लॉक मिलेंगे। वहीं कोलब्लॉक के आवंटन में देरी के लिए कंपनियों को जिम्मेदार ठहराना गलत है।

बहरहाल कैग की रिपोर्ट के बाद सीएजी द्वारा कोल ब्लॉक आवंटन में गड़बड़ी का आरोप लगाने से बाजारों ने शुरुआतीमजबूती गंवाई। कोयला ब्लॉक पाने वाली कंपनियों के शेयरों में आज खासी गिरावट देखी गई। बंबई स्टॉक एक्सचेंज परआर पावर का शेयर 5.60 फीसदी, जेएसपीएल का 4.25 फीसदी, टाटा पावर 3.71 फीसदी, जीएमआर इन्फ्रा 3.07फीसदी और टाटा स्टील का शेयर 0.85 फीसदी की गिरावट के साथ बंद हुआ।बंबई शेयर बाजार का सेंसेक्स कारोबार केदौरान 140 अंक चढ़ने के बाद कोयला ब्लॉकों पर नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) की रिपोर्ट आने के बाद 'घबरा'गया और अंत में यह मात्र 34 अंक की बढ़त के साथ बंद हुआ।वैसे तो नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) की रिपोर्टअक्सर हड़कंप मचाती रही हैं लेकिन पिछले कुछ वर्षों में इसने सरकार के लिए परेशानियां पैदा की हैं। सत्तारूढ़ संयुक्तप्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) सरकार की कैग रिपोर्टों से काफी फजीहत हुई है। मामला चाहे 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले से जुड़ीरिपोर्ट का हो या राष्ट्रमंडल खेलों से जुड़ी अनियमितताओं का, कैग की रिपोर्ट ने सियासी गलियारों में खलबली मचाई।2जी लाइसेंस और स्पेक्ट्रम आवंटन मसले से जुड़ी कैग की विवादास्पद रिपोर्ट 16 नवंबर, 2010 को संसद में पेश कीगई। उससे दो दिन पहले संचार एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री ए राजा ने अपने पद से इस्तीफा दिया था क्योंकि इस रिपोर्टके संसद में पेश किए जाने से पहले ही स्पेक्ट्रम आवंटन विवाद पर काफी हो-हल्ला मच रहा था। दरअसल उस वक्त तकमीडिया में भी 2जी स्पेक्ट्रम से जुड़ी खबरें सुर्खियां बनने लगी थीं। कोयला खदानों के विश्लेषण पर आधारित रिपोर्ट में2G से भी बडे नुकसान की बात कही गई है।

2जी स्पेक्ट्रम घोटाले के बाद सरकार पर कोयला ब्लाकों का आवंटन भारी पड़ गया है। मामला महज कोयला ब्लाकों केहस्तांतरण का नहीं है।खान परियोजनाओं के लिए पांचवी छठीं अनुसूचियों के खुला उल्लंघन,वनक्षेत्र के बेरहम सफाये सेप्रकृति और मनुष्य के सर्वनाश और खनन अधिनियम, पर्यावरण अधिनियम, वनाधिकार कानून, पंचायती राज कानून,पीसा, खान सुरक्षा कानून के खुले उल्लंघन का जो कारोबार चलता है, वह राष्ट्रीय मापिया के बिना असंभव है। कर्नाटक केअवैध खदानों से खनन उद्योग में सत्ता की गहरी पैठ उजागर हो ही चुकी है।कैग रपट से तो महज इसका कारपोरेट चेहराउजागर हुआ है। मुक्त बाजार में अकूत मुनाफा कमाने के लिए कारपोरेट को रंग बिरंगे राहत दिये जाने के इस स्वर्ण युगमें जबकि राष्ट्रपति भवन से लेकर पंचायतों तक में औद्यौगिक घरानों की घुसपैठ है,विपक्ष और सत्तादल समान रुप सेउनके हितों को सुनिश्चित करने में कोई कसर नहीं छोड़ते तो मामूली कैग रपट की क्या औकात कि इस स्वर्णिमव्यवस्था को बदल दें।सीएनजी ने कोयला मंत्रालय को दोषी ठहराते हुए आरोप लगाया है कि सरकार ने बैंक गारंटी ही नहींली। सीएजी ने सरकार को कठघरे में खड़ा करते हुए आरोप लगाया है कि रिलायंस पावर को अतिरिक्त कोयले केइस्तेमाल की इजाजत दी गई। रिलायंस पावर को सासन यूएमपीपी में फायदा पहुंचाया गया है। सीएजी ने सरकार कोसासन यूएमपीपी को आवंटित तीसरे कोल ब्लॉक की समीक्षा करने को कहा है। रिलायंस पावर को सासन यूएमपीपी से29,003 करोड़ रुपये का फायदा हुआ है। रिलायंस पावर को अतिरिक्त कोयले के इस्तेमाल की इजातत के लिए नीलामीप्रक्रिया का उल्लंघन किया गया। सीएजी ने सासन यूएमपीपी के लिए अतिरिक्त कोल ब्लॉक की इजाजत देने के लिएऊर्जा मंत्रालय की खिंचाई की है। रिपोर्ट में ये भी आरोप लगाया गया है कि मुंद्रा, कृष्णापट्टनम पावर डेवलपर्स कोअतिरिक्त जमीन दी गई है।रिलायंस पावर का कहना है कि एडवांस टेक्नोलॉजी की वजह से कंपनी के पास अतिरिक्तकोयला है। कंपनी को दिए गए कोयले के ब्लॉक्स को ईजीओएम से मंजूरी मिली थी। कोयले की मौजूदा कमी को देखतेहुए सीएजी की रिपोर्ट निर्थक है। सासन अल्ट्रा मेगा पावर प्रोजेक्ट के लिए कोयला ब्लॉक्स के आवंटन में कंपनी का कोईलेना-देना नहीं थी।

हमने अपनी पत्रकारिता धनबाद से शुरू की। कोयलांचल और कोयलाखानों में चार साल खपाये। राजनेताओं और कोयलामाफिया के चोली दामन के साथ का चश्मदीद गवाह रहा हूं। बिना काम किये भुगतान से लेकर, खान दुर्घटनाओं औरउन्हें रफा दफा करने के चाक चौबंद बंदोबस्त, कोयला मजूर यूनियनों का खुल्ला खेल फर्ऱूखाबादी और अवैध खनन काकारोबार, सबकुछ देखा है।कोयला माफिया कहीं और कभी स्थानीय नहीं हुआ।जैसा कि मीडिया रपटों और फिल्मी चाशनीमें बताया जाता है। कोयला का गोरखधंधा हमेशा उन तारों की लंबाई और ताकत पर निर्भर रहा है जो या तो सूबे कीराजधानी से या फिर सीधे दिल्ली से जुड़े रहे हैं। संसद में पेश कैग की रिपोर्ट इस मामले में प्रधानमंत्री कार्यालय[पीएमओ] के फैसलों पर भी सवालिया निशान खड़े करती है। बोली के जरिये कोयला ब्लाक आवंटन के फैसले को लागूकरने में हुई सात साल की देरी को लेकर भी कैग ने हैरानी जताई है।कोयला घोटाले पर कैग ने अपनी बहुप्रतीक्षित रिपोर्टशुक्रवार को संसद में पेश कर दी। रिपोर्ट में हालांकि सरकार को हुए नुकसान का आंकड़ा करीब तीन महीने पहले लीक हुईरिपोर्ट के आंकड़े से बेहद कम है। लीक हुई रिपोर्ट में निजी कंपनियों को 57 कोल ब्लाकों के आवंटन से 10.67 लाखकरोड़ रुपये के नुकसान का आंकड़ा सामने आया था। लेकिन, इस रिपोर्ट में केवल 1.86 लाख करोड़ का आंकड़ा है। कैगने इसे सरकार को नुकसान नहीं बल्कि कंपनियों को हुआ फायदा बताया है। चूंकि कैग एक संवैधानिक संस्था है इसलिएयदि वह इसे सरकार को हुए नुकसान के रूप में पेश करती तो उसका असर सरकार के राजस्व संग्रह में हुए नुकसान केरूप में देखा जाता।कैग ने निजी कंपनियों को हुए फायदे का अनुमान ओपन कास्ट खनन के जरिये निकलने वाले कोयलेकी औसत उत्पादन लागत और 2010-11 के मूल्य के अंतर के आधार पर लगाया है। कैग ने प्रतिस्पर्धी बोली के जरियेकोल ब्लाकों के आवंटन के फैसले तक पहुंचने में हुई देरी का सिलसिलेवार ब्योरा रिपोर्ट में प्रस्तुत किया है। इसमेंकोयला मंत्रालय और पीएमओ के बीच हुए संवाद का पूरा ब्योरा शामिल है। 2004 से 2009 के दौरान एक बड़े अरसे तकप्रधानमंत्री मनमोहन सिंह कोयला मंत्रालय का कामकाज भी देख रहे थे।सीएजी की रिपोर्ट ने देश में भूचाल ला दिया है।बीजेपी ने कोयला आवंटन घोटाले को अब तक का सबसे बड़ा घोटाला बताते हुए प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से इस्तीफेकी मांग की। वहीं समाजवादी पार्टी जैसे सहयोगी ने भी केंद्र सरकार को घोटालेबाजों की सरकार तक करार दिया।सरकारने कैग की उस रिपोर्ट को सिरे से खारिज कर दिया, जिसमें कोयला, विमानन तथा बिजली क्षेत्र की निजी कंपनियों को3.06 लाख करोड़ रुपये का अनुचित लाभ देने की बात कही गयी है। सरकार का कहना है कि यह रिपोर्ट भ्रमित करनेवाली है और गलत है। साथ ही यह भी कहा कैग अपने अधिकारों के दायरे में रहकर काम नहीं कर रहा है।

कोयला ब्लाक आवंटन सहित कैग की रिपोर्ट को लेकर विपक्ष द्वारा प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को निशाना बनाये जाने केबीच कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने शुक्रवार को वरिष्ठ मंत्रियों और पार्टी के नेताओं के साथ बैठक की।सोनिया गांधी केनिवास पर हुई इस रणनीति बैठक में हिस्सा लेने वालों में रक्षा मंत्री ए के एंटनी, वित्त मंत्री पी चिदम्बरम, गृह मंत्रीसुशील कुमार शिंदे संसदीय कार्य मंत्री पवन कुमार बंसल और संसदीय कार्य राज्य मंत्री वी नारायणसामी शामिल थे। यहबैठक कैग की रिपोर्ट संसद में आने के कुछ घंटे बाद हुई।विमानान मंत्रालय का कहना है कि दिल्ली एयरपोर्ट से संबंधितसभी मामलों पर फैसले ईजीओएम और कैबिनेट की ओर से लिए गए हैं। सीएजी की इन रिपोर्टों से पब्लिक-प्राइवेटपार्टनरशिप प्रोजेक्ट्स पर बुरा असर होने के आसार हैं। इसके अलावा इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट की तेज प्रगति में ऐसीरिपोर्ट रोड़ा बन सकती हैं। सीएजी ने अपनी रिपोर्ट तैयार करने से पहले विमानन मंत्रालय की राय नहीं ली है। दिल्लीएयरपोर्ट के लिए मंगाई गई बोली पारदर्शी थी और सुप्रीम कोर्ट की देखरेख में नीलामी प्रक्रिया पूरी हुई थी। वहीं एयरपोर्टरेगुलेटर की ओर से डेवलपमेंट फीस तय की जाती है। डेवलपमेंट फीस तय करने में विमानन मंत्रालय की कोई भूमिकानहीं होती। दिल्ली एयरपोर्ट पीपीपी के चलते एयरपोर्ट अथॉरिटी ऑफ इंडिया को 3 लाख करोड़ रुपये का लाभ हुआ है।

इसी के मध्य कोयला खानों के आवंटन में कथित अनियमितताओं की जांच में तेजी लाते हुए सीबीआई ने उन वरिष्ठअधिकारियों से शुक्रवार को पूछताछ की जो 2006-09 के दौरान कोयला मंत्रालय में महत्वपूर्ण पदों पर आसीन थे।

सीबीआई सूत्रों ने कहा कि जांच एजेंसी ने सचिवों व संयुक्त सचिव सहित जांच समिति के सदस्यों से भी पूछताछ की।

सूत्रों ने कहा कि वे आज संसद में पेश की गई कैग की रपट का अध्ययन करेंगे, लेकिन तभी कोई मामला दर्ज करेंगे जबजांच के दौरान कुछ आपराधिक तथ्य सामने आते हैं।उन्होंने कहा कि उस दौरान कोयला खानों के आवंटन में शामिलमुद्दों को समझने के लिए जांच समिति के प्रमुखों से पूछताछ की गई।सूत्रों ने कहा कि जांच एजेंसी ने करीब 15 कंपनियोंके नाम छांटे हैं जिन्होंने कथित तौर पर कोयला खदान आवंटन के नियमों का उल्लंघन किया और उनके अधिकारियों सेपूछताछ जारी है।

सीबीआई ने केंद्रीय सतर्कता आयोग द्वारा उसे सौंपी गई एक शिकायत के संबंध में अज्ञात लोगों के खिलाफ आरंभिकपूछताछ (पीई) दर्ज किया जो कि सीबीआई जांच शुरू करने का पहला कदम है।

कैग की रिपोर्ट में कहा गया कि कच्चे तेल को छोड़कर खदानों के आवंटन के लिए अब तक बोली प्रक्रिया के तौर तरीकोंको नहीं अपनाया जा सका है। हालांकि कोयला ब्लॉकों की बोली प्रक्रिया के लिए वैधानिक संशोधन के जरिये मंजूरी दी जाचुकी है। कोयला मंत्रालय ने कहा कि संप्र्रग सरकार के पहले कार्यकाल के दौरान 2004 में प्रतिस्पर्धी बोली प्रक्रिया केजरिये कोयला ब्लॉकों के आवंटन पर विचार किया गया था।2004 में जब इन कोयला ब्लॉकों का आवंटन हुआ था, तबप्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ही कोयला मंत्रालय का प्रभार संभाल रहे थे। लोकसभा में विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज नेकहा, 'इसके लिए प्रधानमंत्री सीधे तौर पर जिम्मेदार हैं। अब वह किसी तर्क के पीछे नहीं छिप सकते और 2जी मामलेकी तरह इसमें उनके पास राजा या चिदंबरम जैसी ढाल भी नहीं है।' प्रधानमंत्री के बचाव में उतरे प्रधानमंत्री कार्यालय केराज्य मंत्री वी नारायणसामी ने कहा कि कैग अपने कार्यक्षेत्र के बाहर जाकर काम कर रहा है।

इसी बीच टाटा समूह के चेयरमैन रतन टाटा ने जमीन अधिग्रहण व कोयला ब्लॉक की नीलामी को बड़ी चुनौती बताते हुएकहा है कि इससे देश के पावर सेक्टर के विकास में रुकावट पैदा हो रही है।टाटा पावर की सालाना आम बैठक में टाटा नेकहा, 'बढ़ती ऊर्जा जरूरत को पूरा करने के लिए मुख्य ईंधन कोयला। जमीन अधिग्रहण तथा कोयला ब्लॉक की नीलामीको लेकर सवाल है। यह चिंता का कारण है।' उन्होंने कहा, 'सस्ती दर पर बिजली उपलब्ध कराना चुनौती है।'टाटा ने यहबात ऐसे समय में कही है जब कैग की संसद में पेश रिपोर्ट में कहा गया है कि कोयला ब्लाक बिना प्रतिस्पधीर् बोली केदेने से सरकारी खजाने को 1.86 लाख करोड़ रुपये का नुकसान हुआ। रिपोर्ट में टाटा समूह की टाटा स्टील तथा टाटा पावरके भी नाम हैं जिन्हें विभिन्न राज्यों में कोयला ब्लॉक मिले हैं। टाटा ने कहा कि टाटा पावर के सामने जमीन अधिग्रहणतथा पर्यावरण मंजूरी प्रमुख चुनौती है।मोनेट इस्पात के संदीप जाजोडिया का कहना है कि सीएजी द्वारा 1.86 लाख करोड़रुपये के घाटे के अनुमान को लेकर कई सवाल हैं। अगर कोल ब्लॉक्स का आवंटन रद्द किया जाता है तो कंपनियों कोभारी नुकसान होगा। किसी भी कंपनी ने कोयला खदानों का दुरुपयोग नहीं किया है। मंजूरी मिलने में देरी होने की वजहसे कोयला खदानों में उत्पादन लटकता है, जिसको दूर करने के लिए सरकार को कदम उठाने चाहिए।

भारत के नियंत्रक और महालेखापरीक्षक (सीएजी) ने संसद में पेश की गई अपनी रिपोर्ट में सरकार की नीतियों में खामीको सामने लाते हुए कहा कि यदि कोयला क्षेत्र का आवंटन मनमाना तरीके से न कर प्रतिस्पर्धी बोली के आधार पर कियाजाता तो सरकार को 1.85 लाख करोड़ रुपये का राजस्व हासिल होता। साथ ही कैग ने अनिल अंबानी की कंपनी को करीब29,033 करोड़ रुपये का फायदा पहुंचाए जाने की बात भी कही है।रिपोर्ट के मुताबिक मंत्रियों के अधिकारप्राप्त समूह[ईजीओएम] ने अनिल अंबानी की इस कंपनी को यह सहूलियत 2008 में मध्य प्रदेश सरकार के कहने पर दी थी। मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री ने प्रधानमंत्री को नवंबर, 2007 में इस बाबत खत लिखकर अनुरोध किया था। शुक्रवार को राज्यसभामें कोल ब्लॉक आवंटन के अलावा पावर और सिविल एविएशन पर भी कैग की रिपोर्ट पेश की गई। बिजली औरविमानन के मामले में भी कैग ने सरकार के पक्षपातपूर्ण रवैये पर सवाल खड़े किए हैं।कोयले पर कैग की रिपोर्ट में कहागया है कि ब्लॉकों की प्रतिस्पर्धी तरीके से नीलामी न कराने की वजह से प्राइवेट कंपनियों को 1 लाख 85 हजार 591लाख करोड़ रुपये का फायदा हुआ और सरकार को इतने का ही नुकसान हुआ। रिपोर्ट के मुताबिक, मनमानी पूर्ण आवंटनके बजाय इन खदानों की नीलामी की गई होती तो सरकारी खजाने में करीब 1.86 लाख करोड़ रुपये का ज्यादा राजस्वआता। कैग ने अपनी रिपोर्ट में रिलायंस पावर, टाटा स्टील, टाटा पावर, भूषण स्टील, जिंदल स्टील ऐंड पावर, हिंडाल्कोऔर एस्सार ग्रुप समेत 25 कॉर्पोरेट घरानों को फायदा मिलने की बात कही है।कैग ने कहा है कि उसने यह अनुमान कोलइंडिया की वर्ष 2010-11 के दौरान कोयला उत्पादन की औसत लागत और खुली खदान से कोयला बिक्री के औसत मूल्यके आधार पर लगाया है। रिपोर्ट के मुताबिक, 'यदि कोयला ब्लॉक आवंटन के लिए प्रतिस्पर्धी बोलियां मंगाने के कई सालपहले लिए गए फैसले पर अमल कर लिया जाता तो कंपनियों को होने वाले इस अनुमानित वित्तीय लाभ का कुछ हिस्सासरकारी खजाने में पहुंच सकता था।'

कैग के मुताबिक कोयला ब्लाक प्रतिस्पर्धी बोली के जरिये आवंटित करने की नीति लागू करने में हुई देरी का फायदानिजी कंपनियों को हुआ। कैग ने रिपोर्ट में कोयला सचिव के 28 जून, 2004 के उस नोट का जिक्र भी किया है जिसमेंइस नीति को स्वीकार किया गया था। सरकार इसे 2012 में लागू करवा पाई। जबकि, कैग के मुताबिक इस नीति को2006 तक लागू हो जाना चाहिए था। कोयला ब्लाकों का आवंटन 2005 से 2009 के बीच हुआ था।पीएमओ ने इस रिपोर्टको शुरुआती रिपोर्ट बताते हुए कहा है कि कैग ने अपनी सीमाओं से परे जाकर काम किया है। लेकिन, इससे कैग रिपोर्टकी गंभीरता खत्म नहीं होती। जानकारों का मानना है कि सरकार ने इसे संसद में पेश किया है और वह इस पर संज्ञानलेते हुए आगे की कार्रवाई कर सकती है जैसा कि 2जी घोटाले और राष्ट्रमंडल खेलों की तैयारियों में हुए घपले पर कैग कीरिपोर्ट के मामले में हुआ है।

रिपोर्ट के अनुसार सासन अल्ट्रा मेगा पावर परियोजना के लिए सालाना 1.6 करोड़ टन कोयले की जरूरत को देखते हुएसरकार ने रिलायंस पावर को मोहर, मोहर-अमलोहरी एक्सटेंशन और छत्रसाल की तीन कोयला खदानें दी थीं। लेकिनरिलायंस ने इनके कोयले का इस्तेमाल अपनी दूसरी परियोजनाओं के लिए करने की अनुमति लेकर 29,033 करोड़ काअनुचित फायदा उठा लिया। खास बात यह है कि अन्य परियोजनाओं के लिए बिजली टैरिफ आधारित बिडिंग के जरिएबेची जानी थी।

सासन व मुंद्रा के ठेके देने में कदम-कदम पर नियमों के साथ खिलवाड़ किया गया। पहली गड़बड़ी कंसल्टेंसी का ठेकादेने में हुई, जिसे सबसे कम बोली लगाने के बावजूद इक्रा के बजाय अन्र्स्ट एंड यंग [ईएंडवाइ] को दे दिया गया। यहीनहीं, कृष्णापत्तनम और तिलैया यूएमपीपी की कंसल्टेंसी बिना निविदा मंगाए ही ईएंडवाइ को दी गई। वैसे, बाद में पावरफाइनेंस कॉरपोरेशन [पीएफसी] ने गड़बड़ियों के कारण ईएंडवाइ को तीन साल के लिए प्रतिबंधित कर दिया।

निविदा प्रपत्रों के लिए विधि विभाग से जरूरी परामर्श नहीं लिया गया। उलटे विद्युत मंत्रालय समय-समय पर शर्तो मेंढील देता रहा। बोली लगाने वाली कंपनियों के लिए शुरू में यह शर्त थी कि इनमें मूल कंपनी की 51 फीसद हिस्सेदारीहोनी चाहिए। बाद में इसे 26 फीसद कर दिया गया। यूएमपीपी द्वारा क्षमता का कम से कम 85 फीसद बिजली उत्पादनकरने की शुरुआती शर्त को भी बाद में 80 और फिर 75 प्रतिशत कर दिया गया। तिलैया और कृष्णापत्तनम में चुनी गईकंपनी पर इक्विटी-लॉक इन की अवधि को 12 से घटाकर 5 साल कर दिया गया। चारों प्रोजेक्ट में कंपनियों को दो सालमें ही अपनी इक्विटी 51 से 26 फीसद करने की सुविधा दे दी गई। कंपनियों के लिए नेट वर्थ की शर्त भी बहुत ढीली रखीगई। सार्वजनिक निजी भागीदारी [पीपीपी] प्रोजेक्ट में वित्त मंत्रालय की शर्त है कि बोली लगाने वाली की नेट वर्थपरियोजना लागत की 15 प्रतिशत होनी चाहिए। लेकिन यूएमपीपी के मामले में इसे पांच प्रतिशत रखा गया। यानी 20हजार करोड़ के प्रोजेक्ट के लिए केवल 1,000 करोड़ की नेट वर्थ। और तो और मुंद्रा व कृष्णापत्तनम यूएमपीपी के मामलेमें कंपनियों को क्रमश: 1,538 एकड़ और 1,096 एकड़ फालतू जमीन भी दे दी गई।

भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने इस पर जहां प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से तत्काल इस्तीफे की मांग की है, वहीं सरकारने सीएजी के निष्कर्ष को खारिज कर दिया।कोयला आवंटन मामले में कैग की रिपोर्ट के बाद मुश्किल में फंसी सरकार नेविपक्षी पार्टियों की कई राज्य सरकारों को भी लपेटे में ले लिया है। साथ ही सरकार ने कैग की रिपोर्ट को खारिज करते हुएकहा कि इस बारे में सरकार की नीति पारदर्शी थी और उसमें कुछ गलत नहीं हुआ।कोयला मंत्री श्रीप्रकाश जायसवाल नेजोर देकर कहा कि कोल ब्लॉक आवंटन इससे बेहतर तरीके से नहीं हो सकता था। जायसवाल ने कहा कि कई राज्यसरकारों ने भी टेंडर पॉलिसी का विरोध किया था। विरोध करने वालों में राजस्थान, छत्तीसगढ़ और पश्चिम बंगाल कीसरकारें थीं। इन राज्य सरकारों का कहना था कि टेंडर की प्रक्रिया से कोयले की कीमत बढ़ जाएगी और और बिजली भीमहंगी हो जाएगी, जो आम जनता के हित में नहीं है। गौरतलब है कि उस वक्त राजस्थान और छत्तीसगढ़ में बीजेपी कीसरकार और पश्चिम बंगाल में लेफ्ट की सरकार थी।कोयला मंत्री ने कहा कि कोयला ब्लॉकों के आवंटन के लिए अपनाईगई नीति में कोई खामी नहीं थी। कोयला ब्लॉकों के आवंटन के लिए इससे पारदर्शी और नीति नहीं हो सकती थी, क्योंकि2004 में प्रतिस्पर्धी बोली की व्यवस्था ही नहीं थी। जायसवाल ने यहां तक कहा, उस वक्त 3 राज्य सरकारों का कहना थाकि तत्कालीन आवंटन नीति में कोई बदलाव नहीं होना चाहिए। संघीय ढांचा में हमें राज्यों की भावनाओं का सम्मानकरना पड़ता है।

गौरतलब है कि कोयला ब्लॉक आवंटन के लिए प्रतिस्पर्धी बोली व्यवस्था को समय पर लागू करने में विफल रहने केलिए सरकार की आलोचना करते हुए कैग ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि यदि बोली के जरिए आवंटन की प्रक्रिया लागूकर दी जाती तो 1.86 लाख करोड़ रुपये का कुछ हिस्सा सरकार के खजाने में आ सकता था।

जायसवाल ने कहा कि उनका मंत्रालय कैग की रिपोर्ट के सभी पहलुओं से सहमत नहीं है। ऑडिटर ने जो आकलन कियाहै उसमें कोयला ब्लॉक आवंटन के कुछ ही पहलुओं को आधार बनाया गया है। उन्होंने कहा कि प्राइवेट कंपनियों कोकोयला ब्लॉकों के विकास का काम इसलिए दिया गया, क्योंकि सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी कोल इंडिया देश की बढ़तीजरूरत को पूरा नहीं कर पा रही थी। सीएजी के आकलन पर जायसवाल ने कहा कि ये आंकड़े काल्पनिक हैं। जब कोयलाखदान चालू नहीं थे, ऐसे में किसी किस्म के नफे-नुकसान का आकलन करना सही आइडिया नहीं है। उन्होंने कहा किप्राइवेट कंपनियों को आवंटित 57 कोयला ब्लॉकों में से अभी सिर्फ एक से कोयला निकाला जा रहा है।

एविएशन पर कैग की रिपोर्ट में कहा गया है कि दिल्ली के इंदिरा गांधी एयरपोर्ट पर यात्रियों से डिवेलपमंट फीस वसूलनेकी इजाजत देकर जीएमआर के नेतृत्व वाली डायल को 3415.35 करोड़ का फायदा पहुंचाया गया। रिपोर्ट के मुताबिक,ऐसा करके नीलामी की शर्तों का उल्लंघन किया गया है। सरकारी ऑडिटर की रिपोर्ट में कहा गया है कि डायल को 100रुपये सालाना लीज पर जमीन उपलब्ध कराई गई और इससे वह 60 साल के दौरान 1 लाख 63 हजार 557 करोड़ रुपयेकमा सकती है। रिपोर्ट में कहा गया है कि नियमों को धता बताकर सिविल एविएशन मंत्रालय ने डायल को डिवेलपमंटफीस लगाने की मंजूरी दी। पावर पर भी कैग ने सरकार को लपेटा है। रिपोर्ट में अनिल अंबानी के नियंत्रण वाली रिलायंसपावर लिमिटेड (आरपीएल) को आवंटित खदानों से कोयला सासन अल्ट्रा मेगा पावर प्लांट (यूएमपीपी) डाइवर्ट किए जानेका मसला उठाया गया है।

इसके अलावा यह भी आरोप लगा है कि 'महाराजा' से भिखारी बन चुकी इंडियन एयरलाइंस की इस हालत के लिए पूर्वनागरिक उड्डयन मंत्री प्रफुल्ल पटेल को जिम्मेदार हैं। एआई के पूर्व प्रमुख संजीव अरोड़ा ने वर्ष 2005 में तत्कालीनकैबिनेट सचिव बी.के. चतुर्वेदी को चिट्ठी लिखकर प्रफुल्ल पटेल और उनके ओएसडी के. एन. चौबे की शिकायत की थी।उन्होंने पटेल पर आरोप लगाया था कि एआई को नुकसान पहुंचाने वाले कई फैसले लेने के लिए उन्हें और एआई बोर्ड कोमजबूर किया गया।

अरोड़ा ने आरोप लगाया है कि प्रफुल्ल पटेल ने जरूरत से ज्यादा विमान खरीदने को मजबूर किया और इंडियनएयरलाइंस को फायदा मिलने वाले रूट उड़ान भरने से रोका गया। इस पूरी प्रक्रिया में प्राइवेट एयरलाइंस को फायदापहुंचाया गया। चिट्ठी सामने आने के बाद अब लोकसभा में विपक्ष के दो सांसद प्रबोध पांडा (सीपीआई) और निशिकांतदुबे ने सीवीसी से संजीव अरोड़ा के आरोपों की जांच कराने की मांग की है।

डायल को लीज पर दी गई जमीन के बारे में कैग की रिपोर्ट को सिविल एविएशन मिनिस्ट्री ने गुमराह करने वाला करारदिया है। रिपोर्ट में कैग का कहना है कि दिल्ली इंटरनैशनल एयरपोर्ट लिमिटेड (डायल) को सस्ते में जमीन लीज पर दिएजाने से सरकार को 1.63 लाख करोड़ रुपए का नुकसान उठाना पड़ेगा। मंत्रालय ने कहा कि कैग ने उसके अधिकारियों केसाथ बातचीत में कई मसलों- मसलन जमीन, एरोनॉटिकल, नॉन-एरोनॉटिकल सर्विस और बिडिंग की शर्तों का जिक्रनहीं किया। एविएशन सेक्रेटरी सचिव नसीम जैदी ने कैग विनोद राय को लिखी चिट्ठी में कहा है कि कैग की ड्राफ्ट रिपोर्टमें इन मुद्दों को शामिल किया गया है। हालांकि, ये मसले ऐसे हैं जिन पर या तो विचार-विमर्श नहीं हुआ या फिर मंत्रालयको इन पर अपनी स्थिति साफ करने का मौका नहीं दिया गया।

आधिकारिक सूत्रों ने बताया कि मंत्रालय का कहना है कि उसे सफाई देने का मौका नहीं दिया गया। ऐसे में अंतिम रिपोर्टमें शामिल किए गए मुद्दे तथ्यों की दृष्टि से सही नहीं हैं। जैदी द्वारा राय को लिखी गई चिट्टी में कहा गया है कि कैग केनतीजों में कुछ ऐसे मुद्दों को शामिल किया गया है, जिन पर ऑडिट के दौरान विचार नहीं हुआ। इसके मुताबिक, रिपोर्टमें जो 1,63,560.19 करोड़ रुपए के आंकड़े का जिक्र किया गया है, जो वास्तव में गुमराह करने वाला है।

गौरतलब है कि कैग की इस रिपोर्ट को अभी संसद में पेश किया जाना बाकी है। रिपोर्ट में कहा गया है कि अगर सरकारडायल को 100 रुपए सालाना की रियायती दर पर जमीन लीज पर देती है, तो उसे 1.63 लाख करोड़ रुपए के रेवेन्यू कानुकसान होगा। माना जा रहा है कि मंत्रालय ने कैग से इन मुद्दों पर सफाई देने को कहा है। साथ ही, उसने कहा है किऑडिटर द्वारा उठाए गए मुद्दों पर उसे स्पष्टीकरण का मौका दिया जाए।

 

-पलाश विश्वास

 
 

बाबा रामदेव अगर त्याग भाव रख कर मुनाफा त्याग दें...

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Last Updated on Sunday, 30 December 2012 07:24 Written by News Desk Monday, 20 August 2012 10:19

baba ramdev movement against black money

दोस्तों आपको एक राज़ की बात बताते है ..देशभक्त बाबा रामदेव जिन्हें देश की जनता की चिंता है जो कोंग्रेस को भ्रष्ट कहकर हटाने का नारा दे चुके है अगर वोह खुद चाहे तो देश की तस्वीर तो नहीं लेकिन करीब एक करोड़ भारतियों को फायदा पहुंचा सकते हैं लेकिन इसके लियें उन्हें खुद त्याग करना होगा अपने मुनाफे अपने लालच अपनी कालाबाजारी उनके द्वारा किये जा रहे शोषण का ..जी हां दोस्तों जेसा की आप जानते है कमसे कम एक करोड़ लोग ऐसे है जो देश में दवा उपभोक्ता के नाम पर बाबा रामदेव से जुड़े है और जो लोग बाबा रामदेव की दवा ले रहे है वोह लोग गरीब भी .पीड़ित भी है और बीमार भी है ऐसे में वोह तो दया के पात्र है लेकिन दोस्तों अफसोसनाक बात यह है के जिस दवा को निर्माण करने में बाबा रामदेव को दस रूपये खर्च करना पढ़ते है वोह दवा उस बीमार को सो रूपये से भी ज्यादा की कीमत पर बेचीं जाती है तो दोस्तों इस तरह से करोड़ों करोड़ रूपये बाबा उनके भक्तो से जो राष्ट्रभक्त भी है जो गरीब भी है जरुरतमंद भी है कमा रहे है

..अगर बाबा रामदेव इन सभी दवा खरीदने वालों को दवा निर्माण करने में जो कीमत आती है उसपर केवल दो रूपये पांच रूपये का मुनाफा लेकर बेचना शुरू कर दे तो यकीन मानिये देश में कमसे कम एक करोड़ लोगों की तो बल्ले बल्ले हो जाए उन्हें प्रति माह दो तीन सो रूपये की बचत हो सकती है और देश के इन एक करोड़ लोगों को करीब तीस करोड़ प्रति माह का फायदा बाबा रामदेव दे सकते है ...

दोस्तों बाबा रामदेव के यह करीब दस लाख कर्मचारी प्रत्यक्ष और अर्प्त्यक्ष रूप से काम करते है अगर उनको बाबा रामदेव स्थाई कर दे .अगर उन कर्मचारियों को बाबा रामदेव निर्धरितं मापदंडों के अनुरूप न्यूनतम मजदूरी और दूसरी सुविधाए ई एस आई ..पी एफ वगेरा की सुविधा दे दें तो देश के दस लाख परिवार खुशहाली में रह सकते है ..इसी तरह से बाबा रामदेव अगर उनके कमाए हुए धन से अनाथालय खोले ....भोजनालय खोलें ...गरीब लोगों के लियें मुफ्त शिक्षा के स्कूल कोलेज खोले तो यकीन मानिए देश की तस्वीर भी बदल सकती है और लोग बाबा रामदेव को पूजने लगेंगे लेकिन क्या बाबा रामदेव देश के लोगों के लियें खुद का मुनाफा त्याग कर सेवा भाव जाग्रत कर जनहित में ऐसा कर सकेंगे या फिर जनता को ग्राहक समझ कर अपना ब्रांड महंगे दामो पर बेच कर यूँ ही अपना धन साम्राज्य बढाते रहेंगे ..

क्या वोह मजदूरों और कर्मचारियों का शोषण बंद कर न्यूनतम मजदूरी और दूसरी सुविधाएँ उनेह देकर उनेक परिवारों को आबाद करेंगे किया वोह देश भक्त बनकर गरीबों के लियें सेवाश्रम ..अनाथालय ..भोजनालय...स्कूल ..कोलेज..मुफ्त चिकित्सालय खोलेंगे क्या वोह एक पूंजीपति उद्योगपति मुनाफाखोर से अलग हट कर देश और देश के गरीब लोगों के लियें सोच कर त्याग का भाव रख कर खुद को संत साबित कर सकेंगे अगर ऐसा करें तो उनका स्वागत है पुरे देश की तस्वीर तो नहीं लेकिन कमसे कम एक करोड़ से अधिक लोग तो उनसे आजीवन फायदा उठा सकते है और देश को काफी फायदा भी हो सकता है तो बाबा अगर यह सब करें तो उनकी जय वरना उनके दिल में उनके दिमाग में और उनकी जुबान में क्या है इस सच को समझे और उजागर करें भाई ...

अख्तर खान अकेला

 

 
 

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