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बलात्कारी संस्कृति के लिए दोषी कौन?

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Written by News Desk Wednesday, 26 December 2012 16:38

Rape

मित्रों,जब मैं बच्चा था तब अक्सर देखा करता था कि बकरी का नर बच्चा अक्सर अपनी सहोदर बहनों और जन्मदात्री माँ के साथ सेक्स संबंध बनाने को उतावला हो उठता था। तब मैं सोंचता था कि क्या भविष्य में हम भारतीयों की भी यही स्थिति होनेवाली है? भारतीयों की इसलिए क्योंकि तब तक पश्चिम के समाज के बारे में मैं सुन-पढ़कर जान चुका था वहाँ इहलोकवाद का तूफान काफी समय से चल रहा है और वहाँ का समाज जानवरों के समाज की तरह काफी हद तक सेक्स-फ्री हो चुका है।

मैं सोंचता था कि क्या भविष्य में विश्वगुरू भारत में भी शरीर और सेक्स-संतुष्टि का महत्त्व इतना ज्यादा हो जाएगा कि सारे रिश्तों की गरिमा तार-तार कर दी जाएंगी? दुर्भाग्यवश वह समय बहुत जल्दी और मेरे अनुमान के विपरीत मेरी जिन्दगी में ही आ गया है। आज जब भी मैं समाचार-पत्रों में पढ़ता हूँ कि गुरू ने शिष्या का यौन-शोषण या बलात्कार किया,आज जब भी किसी पिता की खुद अपनी ही बेटी के प्रति हैवानियत की खबरें देखता या पढ़ता हूँ तो मुझे वह बचपनवाला बकरी का बच्चा याद आ जाता है। आखिर क्यों हुआ ऐसा और हुआ भी तो इतनी तेजी से क्यों हुआ? क्यों इतनी जल्दी हम भारतीयों की ईन्सानियत मर गई? ज्यादा नहीं पचास साल पहले का भारत तो बिल्कुल भी ऐसा नहीं था।

मित्रों,दरअसल पिछले पचास सालों में हमारा समाज काफी कुछ बदला है। हमारे समाज ने इन पचास सालों में पहले थियेटरों/सिनेमाघरों में फिल्मों को देखा,फिर रेडियो पर मादक फिल्मी गीतों को सुना,फिर टेलीवीजन ने हमारे घरों को ही सिनेमाघर बना दिया और उल्टे-सीधे धारावाहिक दिखाए और अंत में आया इन्टरनेट जिसने अश्लील वीडियो-फिल्मों को पहले घर-घर और फिर मोबाईल-मोबाईल तक पहुँचा दिया। पिछले पचास सालों में वैज्ञानिकता के नाम पर सरकारी प्रचार-माध्यमों और सरकारी पाठ्यक्रमों ने हमारी धार्मिक मान्यताओं पर मरणान्तक प्रहार किया और लोगों की धार्मिक-आस्थाओं की ऐसी की तैसी कर दी। हम भूल गए आईन्सटीन की चेतावनी को कि बिना धर्म के विज्ञान अंधा होता है। हम भूल गए कि विज्ञान हमारे जीवन को आसान बना सकता है लेकिन नैतिक-मूल्यों के प्रति हमारे मन में आस्था उत्पन्न नहीं कर सकता।

आज का औसत भारतीय परलोक की बिल्कुल भी चिन्ता नहीं करता और उसके लिए अगर पैसा ही भगवान हो गया है,तो क्यों? क्यों आज का भारतीय न तो ईश्वर को मानता है और न ही उससे डरता है? क्योंकि पहले तो हमने भारतीय-विश्वास और अध्यात्म की धज्जियाँ उसको विज्ञान की कसौटी पर कसकर उड़ा दीं (जबकि आस्था विश्वास करने की चीज है न कि तर्क या विज्ञान की कसौटी पर कसने की) और जब हमारे देशवासियों के दिमाग से परलोकवाद और ईश्वर निकल गया या उसका प्रभाव कमजोर पड़ गया तब हमने उसमें अश्लीलता भर दी। इतना ही नहीं हमारी सरकारों ने कथित रूप से खाली खजानों को भरने के लिए जनता के हाथों में शैतान का पर्याय शराब की बोतलें भी पकड़ा दीं। पीयो और खुद को भी भूल जाओ। भूल जाओ सारे रिश्तों की अहमियत को,भूल जाओ कि तुम एक ईन्सान हो।

मित्रों,आज जबकि रह-रहकर बलात्कार की दिलो-दिमाग को हिला देनेवाली घटनाएँ सामने आने लगी हैं तो हम अपने दिमाग के कार्बुरेटर में आ गए कचरे को साफ करने की बात नहीं कर रहे और सतही या बाहरी उपाय करने में लगे हैं। हम बसों के शीशों का रंग बदलने की बात कर रहे हैं और बसों से पर्दा हटाने का आदेश दे रहे हैं। हम अति हास्यास्पद तरीके से कभी बलात्कारियों को फाँसी देने की मांग कर रहे हैं तो कभी रात में चलनेवाले बसों में बल्ब जलाए रखने का निर्देश दे रहे हैं। मैं पूछता हूँ कि ऐसे तुगलकी आदेशों का अक्षरशः पालन करवाएगा कौन? मैं पूछता हूँ कि क्या वर्तमान भारत में सिर्फ बसों में ही बलात्कार किए जा रहे हैं? अगर कोई बाप अपनी बेटी या कोई भाई अपने बहन की अस्मत पर खुद ही हाथ डालता है तो क्या उसे हमारी कोई भी सरकार या कानून रोक सकता है? क्यों आज हमारी बहनों को सबसे ज्यादा खतरा खुद के घर में ही है? क्यों जनता की जान-माल और अस्मत की रक्षा के लिए बनाए गए थानों में ही सबसे ज्यादा बलात्कार की घटनाएँ होती हैं? क्या इन सवाल पर कभी हमारे सिरफिरे राजनेताओं और नीति-नियंताओं ने विचार किया है? क्या उन्होंने कभी गंभीरतापूर्वक विचार किया है कि क्यों आज का औसत भारतीय ईन्सान से जानवर बनता जा रहा है और इस नैतिक गिरावट को कैसे रोका जा सकता है?क्या उनके दिमाग ने कभी इस बात पर चिन्तन किया है कि ऐसे क्या उपाय किए जाने चाहिए जिससे ईन्सान के बच्चे और बकरी के बच्चे के बीच का अंतर पुनर्स्थापित हो सके?

मित्रों,यदि वे लोग ऐसा नहीं सोंच रहे हैं तो फिर मुझे बड़े दुःख के साथ स्वीकार करना पड़ेगा कि निकट-भविष्य में बलात्कार की घटनाएँ रूकना तो दूर कम भी नहीं होनेवाली हैं। अगर हम शिक्षा-प्रणाली सहित हर बात में पश्चिम का अंधानुकरण करेंगे तो हम भारत को ऐसा विचित्र भारत बनाकर रख देंगे जिसे भारत का कोमल हृदय कभी भी स्वीकार नहीं करेगा। कहना न होगा कि अगर हम एक आम भारतीय को फिर से जानवर से ईन्सान बनाना चाहते हैं तो हमें अपने बच्चों को एक बार फिर से वेदों और उपनिषदों की शिक्षा देनी पड़ेगी। एक बार फिर से यम,नियम,योग और ब्रह्मचर्य का पाठ पढ़ाना पड़ेगा। उनको शंकर के मायावाद,अद्वैतवाद और रामानुज के विशिष्टाद्वैतवाद की शिक्षा देना होगी।

हमें उनके दिलो-दिमाग में फिर से अपनी महान संस्कृति और ईश्वर के प्रति अटूट आस्था पैदा करनी पड़ेगी। अगर सरकारी स्कूलों में ऐसा पाठ्यक्रम लागू करने में हमारे नेताओं की कथित धर्मनिरपेक्षता बाधा बनती है तो उतार फेंकना होगा ऐसी भारतीयता व मानवता-विनाशक कथित धर्मनिरपेक्षता को तभी हम फिर से एक आम भारतीय को पशु से मानव और मानव से देवता बना पाएंगे और कविवर आरसी प्रसाद सिंह की तरह सिर उठाकर गा सकेंगे कि-हमारा देश भारत है नदी गोदावरी गंगा,लिखा भूगोल ने जिस पर हमारा चित्र बहुरंगा। जहाँ हर बाग है नंदन,जहाँ हर पेड़ है चंदन;जहाँ देवत्त्व भी करता मनुज के पुत्र का वंदन,मनुज के पुत्र का वंदन,मनुज के पुत्र का वंदन।।।

ब्रजकिशोर सिंह

 

24 घंटे में 66 बलात्कार

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Last Updated on Wednesday, 19 December 2012 12:36 Written by News Desk Wednesday, 19 December 2012 12:09

rape

भूख के कई रूप हैं…एक है पेट की भूख…जो इंसान को कुछ भी करने को मजबूर कर देती है…कुछ लोग इस भूख को नजरअंदाज करने की कोशिश करते हैं लेकिन बार बार लौट पर आने वाली भूख कई बार इंसान पर भारी पड़ती है और आखिर में इंसान को ही खा जाती है…भारत में हर रोज भूख से होने वाली होने वाली करीब 5 हजार मौतें ये बताने के लिए काफी है। भूख का एक और रूप है जो इंसान की जान तो नहीं लेता लेकिन जिस पर ये भूख टूटती है वो एक जिंदा लाश बनकर रह जाती है। उसे अपना जीवन खुद पर बोझ लगने लगता है…और कई बार हमने देखा है कि इस भूख की शिकार महिलाएं, युवतियां इस बोझ को नहीं ढ़ो पाती और खुद मौत को गले लगा लेती हैं। भूख के इस दूसरे रूप को “हवस” के नाम से भी जाना जाता है।


दिल्ली रविवार रात चलती बस में जो हुआ वो भूख का ही दूसरा रूप था या कहें कि एक वहशीपन था जिसे कोई शैतान ही अंजाम दे सकता है। पुलिस ने भले ही 6 में से 4 आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया हो…और माना इनको सजा भी हो जाएगी…क्योकि इन्होंने जघन्य अपराध किया है…लेकिन जिस लड़की के साथ ये घटित हुई या होती आयी है…उसे तो दोषियों से भी बड़ी सजा मिलती है। ऐसे में सवाल ये उठता है कि आखिर कब तक इस तरह की घटनाएं होती रहेंगी और आखिर क्यों हर बार पुलिस और सरकार इन घटनाओं के होने के बाद ही हरकत में आती हैं और इन घटनाओं को रोकने के लिए इस पर मंथन होता है ?


देश में पहले भी ऐसी घटनाएं हो चुकी हैं लेकिन सवाल वहीं का वहीं है कि उसके बाद की जाने वाली बड़ी बड़ी बातें सिर्फ बातों तक ही सीमित रह जाती हैं और उन पर अमल नहीं होता और इसका नतीजा ये होता है कि कुछ अंतराल के बाद ऐसी ही घटनाओं की गूंज तन बदन को झकझोर कर रख देती है। राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो के सिर्फ 2011 के आंकड़ों पर ही नजर डाल लें तो तस्वीर काफी हद तक साफ हो जाती है कि आखिर महिलाएं कितनी सुरक्षित हैं। महिलाओं के साथ बलात्कार, शारीरिक उत्पीड़न और छेड़छाड़ के साथ ही महिलाओं के अपहरण और घर में पति या रिश्तेदारों के उत्पीड़न के मामलों की लिस्ट काफी लंबी है। साल 2011 में हर रोज 66 महिलाएं बलात्कार की शिकार हुई। एनसीआरबी के अऩुसार 2011 में बलात्कार के 24 हजार 206 मामले दर्ज हुए जिनमें से सजा सिर्फ 26.4 फीसदी लोगों को ही हुई जबकि महिलाओं के साथ बलात्कार के अलावा उनके शारीरिक उत्पीड़न, छेड़छाड़ के साथ ही उनके उत्पीड़न के 2 लाख 28 हजार 650 मामले दर्ज किए गए जिसमें से सजा सिर्फ 26.9 फीसदी लोगों को ही हुई।


ये वो आंकड़ें हैं जिनमें की हिम्मत करके पीड़ित ने दोषियों के खिलाफ पुलिस में रिपोर्ट दर्ज कराई…इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि असल में ऐसी कितनी घटनाएं घटित हुई होंगी क्योंकि आधे से ज्यादा मामलों में पीड़ित समाज में लोक लाज या फिर दबंगों के डर से पुलिस में शिकायत ही नहीं करती या उन्हें पुलिस स्टेशन तक पहुंचने ही नहीं दिया जाता है। सबसे बड़ी बात ये है कि आंकड़ें इस पर से पर्दा हटाते हैं कि इन मामलों में कार्रवाई का प्रतिशत सिर्फ 25 है…यानि कि 75 फीसदी मामले में या तो आरोपी बच निकले या फिर ये मामले सालों तक कोर्ट में लंबित पड़े रहते हैं और आरोपी जमानत पर खुली हवा में सांस ले रहा होता है। शायद यही वजह है कि इंसान के रूप में समाज में घूम रहे ऐसे वहशी दरिंदे कानून की इन खामियों का फायदा उठाते हैं और सरेआम ऐसे जघन्य अपराध करने से भी नहीं चूकते क्योंकि वे उन्हें लगता है कि आसानी से कानून की इन खामियों का फायदा उठाकर वे बच निकलेंगे।


मैंने अपने आसपास कुछ महिलाओं और लड़कियों से ऐसे अपराधियों को सजा देने पर उनकी राय जाननी चाही तो उनके चेहरा जवाब देते वक्त गुस्से से लाल था और उनके मन से जो आवाज निकली वो थी कि ऐसे अपराधियों का जिंदा रहना समाज के हित में नहीं है और इन्हें मौत की सजा की सबने वकालत की। कोई चौराहे पर फांसी देने की बात कह रही थी तो कोई सरेआम गोलियों से भून देने की बात कर रही थी। संसद में दिल्ली गैंगरेप के बाद ऐसे आरोपियों को फांसी की सजा देने की बात उठी और गृहमंत्री ने भी सख्त से सख्त कार्रवाई का भरोसा तो दिलाया है…लेकिन इसके बाद भी सच ये है कि महिलाएं खुद को सुरक्षित महसूस नहीं कर पा रही हैं। जरूरत इस बात कि है कि दिल्ली की इस घटना के बाद जो बड़ी बड़ी बातें की जा रही हैं…सरकार के साथ ही पुलिस भी उन पर अमल करे और इन घटनाओं को रोकने के साथ ही महिलाओं की सुरक्षा के लिए सरकार गंभीर कदम उठाने पर तत्काल फैसला ले। इसके साथ ही बलात्कार जैसे जघन्य अपराध करने वालों को कड़ी से कड़ी सजा देने के प्रावधान पर सरकार पूरी गंभीरता से विचार करे…एक ऐसी सजा जिसके बारे में सोचने पर ही अपराध करने से पहले अपराधी हजार बार सोचे।


दीपक तिवारी

 
 

अफ़ज़ल और संसद पर हमले की अजीबो-ग़रीब दास्तान

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Last Updated on Sunday, 30 December 2012 07:14 Written by News Desk Wednesday, 12 December 2012 15:17

2001 Indian Parliament attack

कसाब की फांसी के बाद, अफ़ज़ल को भी जल्दी ही फांसी की मांग उठाए जाने की पृष्ठभूमि में यह आलेख पढ़ने को मिला. 13 दिसम्बर, संसद पर हमले की तारीख़ की आमद के मद्देनज़र अरुंधति रॉय के इस आलेख को गंभीरता से पढ़ा जाना और आम किया जाना और भी मौज़ूं हो उठता है. हिंदी में यह अभी नेट पर उपलब्ध नहीं है, इसीलिए इसे यहां प्रस्तुत करना आवश्यक लग रहा है. आलेख लंबा है अतः व्यक्तिगत टाइपिंग की सीमाओं के बरअक्स यह कुछ भागों में प्रस्तुत किया जाएगा.

अरुंधति आलेख के अंत में कहती हैं, ‘यह जाने बग़ैर कि दरअसल क्या हुआ था, अफ़ज़ल को फांसी पर चढ़ाना ऐसा दुष्कर्म होगा जो आसानी से भुलाया नहीं जा पायेगा। न माफ़ किया जा सकेगा। किया भी नहीं जाना चाहिए।’ इसी परिप्रेक्ष्य में अफ़ज़ल की कहानी और भारतीय संसद पर हमले की अजीबो-ग़रीब दास्तान से बावस्ता होने का जिगर टटोलिए

भारतीय संसद पर हमले की अजीबो-ग़रीब दास्तान (पहला भाग )

इतना भर हम जानते हैं : 13 दिसम्बर, 2001 को भारतीय संसद का शीतकालीन सत्र चल रहा था। ( राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन, एनडीए सरकार पर एक और भ्रष्टाचार के प्रवाद को लेकर हमले हो रहे थे ) सुबह के साढ़े ग्यारह बजे पांच हथियारबंद आदमी एक सफ़ेद अम्बैसेडर कार में, जिसमें कामचलाऊ विस्फोटक उपकरण ( इम्प्रोवाइज़्ड एक्सप्लोज़िव डिवाइस ) लगा हुआ था, नई दिल्ली में संसद भवन के फाटक से होकर बढ़े। जब उनको रोका गया तो वे कार से कूदे और उन्होंने गोलियां बरसानी शुरू कर दीं। इसके बाद की गोलीबारी में सारे-के-सारे हमलावर मार गिराये गये। आठ सुरक्षाकर्मी और एक माली भी मारा गया। पुलिस ने कहा कि मारे गये आतंकवादियों के पास संसद भवन को उड़ाने के लिए काफ़ी विस्फोटक पदार्थ और एक पूरी बटालियन का सामना करने के लिए गोला-बारूद था।1अधिकतर आतंकवादियों के विपरीत, ये पांच अपने अपने पीछे सुराग़ों की जबरदस्त श्रृंखला छोड़ गये – हथियार, मोबाइल फ़ोन, फ़ोन नंबर, पहचान पत्र, फ़ोटो, सूखे मेवों के पैकेट, यहां तक कि एक प्रेम-पत्र भी।2

आश्चर्य नहीं कि प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने मौक़े का फ़ायदा उठाते हुए हमले की तुलना अमरीका के 11 सितंबर के आक्रमण से की, जो सिर्फ़ तीन महिने पहले की घटना थी।

संसद पर आक्रमण के दूसरे दिन, 14 दिसम्बर, 2001 को दिल्ली पुलिस के स्पेशल सेल ने दावा किया कि उसने ऐसे कई लोगों का पता लगा लिया है, जिन पर इस षडयंत्र में शामिल होने का संदेह है। एक दिन बाद, 15 दिसम्बर को उसने घोषणा की कि उसने ‘मामले को सुलझा लिया था’ : पुलिस ने दावा किया कि हमला पाकिस्तान आधारित दो आतंकवादी गुटों, लश्कर-ए-तैयबा और जैश-ए-मोहम्मद का संयुक्त अभियान था। इस षडयंत्र में 12 लोगों के शामिल होने की बात कही गयी। जैश-ए-मोहम्मद का ग़ाज़ी बाबा ( आरोपी नंबर -1), जैश-ए-मोहम्मद का ही मौलाना मसूद अज़हर ( आरोपी नंबर -2), तरीक़ अहमद ( पाकिस्तानी नागरिक ), पांच मारे गये ‘पाकिस्तानी आतंकवादी’( आज तक हम नहीं जानते कि वे कौन थे ) और तीन कश्मीरी मर्द एस.ए.आर. गिलान, शौकत गुरू और मोहम्मद अफ़ज़ल। इसके अलावा शौकत की बीबी अफ़सान गुरू। सिर्फ़ यही चार गिरफ़्तार हुए।3

उसके बाद के तनाव-भरे दिनों में संसद को स्थगित कर दिया गया। 21 दिसम्बर को भारत ने अपने राजदूत को पाकिस्तान से वापस बुला लिया, हवाई, रेल और बस संपर्क रोक दिये गये और हमारी वायु-सीमा से गुज़रने वाली पाकिस्तानी उडानोंपररोक लगा दी गयी। भारत ने युद्ध की जबरदस्त तैयारी शुरू कर दी और पांच लाख से ज़्यादा सैनिकों को पाकिस्तान की सीमा पर भेज दिया गया। विदेशी दूतावासों ने अपने कर्मचारियों को हटाना शुरू कर दिया और भारत आने वाले पर्यटकों को यात्रा की चेतावनी वाली सलाह जारी कर दी। परमाणु युद्ध के कगार की ओर बढ़ते उपमहाद्वीप को दुनिया सांस रोककर देखने लगी।4 भारत को इस सबकी क़ीमत जनता के दस हज़ार करोड़ रुपये ख़र्च करके चुकानी पड़ी। कुछ सौ सैनिक तो हड़बड़ाहट-भरी तैनाती की प्रक्रिया में ही जान से हाथ धो बैठे।

लगभग साढे़ तीन साल बाद, 4 अगस्त, 2005 को इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने अपना अंतिम फ़ैसला सुना दिया। उसने इस दृष्टिकोण की पुष्टि की कि संसद पर हमले को जंगी कार्रवाई के तौर पर लिया जाना चाहिए। उसने कहा ‘संसद पर आक्रमण की कोशिश निःसंदेह भारतीय राज्य और सरकार की, जो उसकी ही प्रतिरूप है, प्रभुसत्ता का अतिक्रमण है…मृत आतंकवादियों को जबरदस्त भारत विरोधी भावनाओं से भड़काकर यह कार्रवाई करने के लिए प्रेरित किया गया जैसा कि कार ( एक्स.पी डब्लू 1-8 ) पर पाये गये गृहमंत्रालय के नक़ली स्टिकर में लिखे हुए शब्दों से भी साबित होता है।’ न्यायालय ने आगे कहा, ‘कट्टर फ़ियादिनों ने जो तरीक़े अपनाये वे सब भारत सरकार के ख़िलाफ़ जंग छेड़ने की मंशा दर्शाते हैं।’

गृहमंत्रालय के नक़ली स्टिकर पर जो लिखा था, वह यह है :

‘हिन्दुस्तान बहुत ख़राब मुल्क है और हम हिन्दुस्तान से नफ़रत करते हैं, हम हिन्दुस्तान को बर्बाद कर देना चाहते हैं और अल्लाह के करम से हम ऐसा करेंगे अल्लाह हमारे साथ है और हम भरसक कोशिश करेंगे। यह मूरख वाजपेयी और आडवाणी हम उन्हें मार देंगे। इन्होंने बहुत से मासूम लोगों की जानें ली हैं और वे बेइन्तहा ख़राब इन्सान हैं, उनका भाई बुश भी बहुत ख़राब आदमी है, वह अगला निशाना होगा। वह भी बेकुसूर लोगों का हत्यारा है उसे भी मरना ही है और हम यह कर देंगे।’5

चतुराई-भरे शब्दों में लिखी गयी यह स्टिकर-घोषणा संसद की ओर जाते कार-बम के अगले शीशे पर लगा हुआ था। ( इस पाठ में जितने शब्द हैं उन्हें देखते हुए यह हैरत की बात है कि ड्राइवर कुछ देखने की स्थिति में रहा भी होगा। शायद यही कारण है कि वह उप-राष्ट्रपति की कारों के काफ़िले से टकरा गया था? )

पुलिस ने अपना आरोप-पत्र एक त्वरित-सुनवाई अदालत में दायर किया जो कि ‘आतंकवाद निरोधक अधिनियम’ ( पोटा ) के मामलों को निपटाने के लिए स्थापित की गयी थी। निचली अदालत ( ट्रायल कोर्ट ) ने 16 दिसम्बर, 2002 को गिलानी, शौकत और अफ़ज़ल को मौत की सज़ा सुनायी। अफ़सान गुरू को पांच वर्ष की कड़ी कैद की सज़ा दी गयी। साल भर बाद उच्च न्यायालय ने गिलानी और अफ़सान गुरू को बरी कर दिया। लेकिन शौकत और अफ़ज़ल की मौत की सज़ा को बरकरार रखा। इसके बाद सर्वोच्च न्यायालय ने भी रिहाइयों को यथावत् रखा और शौकत की सज़ा को 10 वर्ष की कड़ी सज़ा में तब्दील कर दिया। लेकिन उसने न केवल मोहम्मद अफ़ज़ल की सज़ा को बरक़रार रखा, बल्कि बढ़ा दिया। उसे तीन आजीवन कारावास और दोहरे मृत्युदंड की सज़ा दी गयी।

4 अगस्त, 2005 के अपने फ़ैसले में सर्वोच्च न्यायालय ने साफ़-साफ़ कहा है कि इस बात का कोई प्रमाण नहीं है कि मोहम्मद अफ़ज़ल किसी आतंकवादी गुट या संगठन का सदस्य है। लेकिन न्यायालय ने यह भी कहा है : ‘जैसा कि अधिकांश षड्यंत्रों के मामले में होता है, उस सांठ-गांठ का सीधा प्रमाण नहीं हो सकता और न है जो आपराधिक षड्यंत्र ठहरती हो। फिर भी, कुल मिलाकर आंके जाने पर परिस्थितियां अचूक ढंग से अफ़ज़ल और मारे गये ‘फ़ियादीन’ आतंकवादियों के बीच सहयोग की ओर इशारा करती हैं।’

यानि सीधा कोई प्रमाण नहीं है, लेकिन परिस्थितिजन्य प्रमाण हैं।

फ़ैसले के एक विवादास्पद पैरे में कहा गया है : ‘इस घटना ने, जिसके कारण कई मौतें हुईं, पूरे राष्ट्र को हिला दिया था और समाज का सामूहिक अन्तःकरण तभी संतुष्ट होगा जब अपराधी को मृत्युदंड दिया जायेगा।’6

हत्या के अनुष्ठान को, जो  कि मृत्युदंड वास्तव में है, सही साबित करने की ख़ातिर ‘समाज के सामूहिक अन्तःकरण’ का आह्वान करना भीड़ द्वारा हत्या करने के क़ानून को मानक बनाने के बहुत नज़दीक आ जाता है। यह सोचकर रोंगटे खड़े हो जाते हैं कि यह हमारे ऊपर शिकारी राजनेताओं या सनसनी तलाशते पत्रकारों की ओर से नहीं आया ( हालांकि उन्होंने भी ऐसा किया है ), बल्कि देश की सबसे बड़ी अदालत की ओर से एक फ़रमान की तरह जारी हुआ है।

अफ़ज़ल को फांसी की सज़ा देने के कारणों को स्पष्ट करते हुए फ़ैसले में आगे कहा गया है, ‘अपील करने वाला, जो हथियार डाल चुका उग्रवादी है और जो राष्ट्रद्रोही कार्यों को दोहराने पर आमादा था, समाज के लिए एक ख़तरा है और उसकी ज़िंदगी का चिराग़ बुझना ही चाहिए।’

यह वाक्य ग़लत तर्क और इस तथ्य के निपट अज्ञान का मिश्रण है कि आज के कश्मीर में ‘हथियार डाल चुका उग्रवादी’ होने का क्या मतलब होता है।

सो : क्या मोहम्मद अफ़ज़ल की ज़िंदगी का चिराग़ बुझना ही चाहिए?

बुद्धिजीवियों, कार्यकर्ताओं, संपादकों, वकीलों और सार्वजनिक क्षेत्र के महत्त्वपूर्ण लोगों के एक छोटे-से, लेकिन प्रभावशाली समूह ने नैतिक सिद्धांत के आधार पर मृत्युदंड का विरोध किया है। उनका यह भी तर्क है कि ऐसा कोई व्यावहारिक प्रमाण नहीं है जो सुझाता हो कि मौत की सज़ा आतंकवादियों के लिए अवरोधक का काम करती है। ( कैसे कर सकती है, जब फ़िदायीनों और आत्मघाती बमवारों के इस दौर में मौत सबसे बड़ा आकर्षण बन गई जान पड़ती हो? )

अगर जनमत-संग्रह ( ओपिनियन पोल ), संपादक के नाम पत्र और टीवी स्टूडियो के सीधे प्रसारण में भाग ले रहे दर्शक भारत में जनता की राय का सही पैमाना हैं तो हत्यारी भीड़ ( लिंच मॉब ) में घंटे-दर-घंटे इज़ाफ़ा हो रहा है। ऐसा लगता है मानो भारतीय नागरिकों की बहुसंख्यक आबादी मोहम्मद अफ़ज़ल को अगले कुछ वर्षों तक हर दिन फांसी पर चढ़ाये जाते हुए देखना चाहेगी, जिनमें सप्ताहांत की छुट्टियां भी शामिल हैं। विपक्ष के नेता लालकृष्ण आडवाणी, अशोभनीय हड़बड़ी प्रदर्शित करते हुए, चाहते हैं कि उसे फ़ौरन से पेश्तर फांसी दे दी जाये, एक मिनट की भी देर किये बिना।7

इस बीच कश्मीर में भी लोकमत उतना ही प्रबल है। ग़ुस्से से भरे बड़े-बड़े प्रदर्शन बढ़ती हुई मात्रा में यह स्पष्ट करते जा रहे हैं कि अगर अफ़ज़ल को फांसी दी गयी तो इसके राजनैतिक परिणाम होंगे। कुछ इसे न्याय का विचलन मानकर इसका विरोध कर रहे हैं, लेकिन विरोध करते हुए भी वे भारतीय न्यायालयों से न्याय की अपेक्षा नहीं करते। वे इतनी ज़्यादा बर्बरता से गुज़र चुके हैं कि अदालतों, हलफ़नामों और इन्साफ़ पर उनका अब कोई विश्वास नहीं रह गया है। कुछ दसरे लोग भी हैं जो चाहते हैं कि मोहम्मद अफ़ज़ल मक़बूल बट्ट की तरह फांसी चढ़ जाये – कश्मीर के स्वतंत्रता-संघर्ष के एक गर्वीले शहीद के रूप में।8 कुल मिलाकर, ज़्यादातर कश्मीरी मोहम्मद अफ़ज़ल को एक युद्धबंदी की तरह देखते हैं, जिस पर क़ब्ज़ा करने वाली ताक़त की अदालत में मुक़दमा चल रहा है ( जो निस्संदेह सच है )। स्वाभाविक रूप से राजनैतिक दलों ने भारत में भी और कश्मीर में भी हवा को सूंघ लिया है और बेमुरव्वती से जस्त लगाये, शिकार पर झपट पड़ने के लिए बढ़ रहे हैं।

दुखद यह है कि इस पागलपन में लगता है अफ़ज़ल ने व्यक्ति होने का अधिकार गंवा दिया है। वह राष्ट्रवादियों, पृथकतावादियों और मृत्युदंड विरोधी कार्यकर्ताओं – सबकी कपोल-कल्पनाओं का माध्यम बन गया है। वह भारत का महा-खलनायक बन गया है और कश्मीर का महानायक – महज़ यह सिद्ध करते हुए कि हमारे विद्धज्जन, नीति-निर्धारक और शांति के गुरू चाहे जो कहें, इतने साल बाद भी कश्मीर में युद्ध को किसी भी तरह ख़त्म हुआ नहीं कहा जा सकता।

ऐसी परिस्थिति में, जो इतनी आशंका भरी हों और जिसका इस हद तक राजनीतिकरण कर दिया गया हो, यह मानने का लालच होता है कि हस्तक्षेप का समय आकर चला गया है। आख़िरकार, कानूनी प्रक्रिया चालीस महीने चली और सर्वोच्च न्यायालय ने उन साक्ष्यों को जांचा है जो उसके सामने मौजूद थे।  उसने आरोपियों में से दो को सज़ा सुना दी और दो को बरी कर दिया। निश्चय ही यह अपने आप में न्याय की वस्तुपरकता का प्रमाण हैं? इसके बाद कहने को क्या रह जाता है? इसे देखने का एक और तरीक़ा भी है। क्या यह अजीब नहीं है कि अभियोजन पक्ष आधे मामले में इतने विलक्षण ढंग से ग़लत साबित हुआ और आधे में इतने शानदार तरीक़े से सही?

( अगली बार लगातार… दूसरा भाग )


 
 

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